मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ मार्क्सवाद और रामराज्य और पीत मंगोलका मिश्रण होनेपर उनसे कुछ पश्चिमीय रूप-रंगके और कुछ मंगोल रूप-रंगके होते हैं। परंतु अधिकांश पारसी, ईरानी ढंगके होते हैं। इसी दृष्टिसे निश्चित किया जा सकता है कि पारसी जाति इन्ही दोनोंका मिश्रण है। यही स्थिति उत्तर भारतकी उच्च जातियोंमें भी है। वहाँ मिश्रण स्पष्ट है। परंतु ऐसा कहना ठीक नहीं है। जैसे मुर्गोंमें यह देखा जाता है, वैसे ही अन्य जातियोंमे इसका व्यभिचार भी देखा जाता है। 'कलमी आमोंमें कभी भी मूल आमके समान फल नहीं होते। व्यक्तियोंके रूप, रंग, ऊँचाईमे एकता, शरीरके हर एक अङ्गमें स्पष्टता शुद्ध जातिके चिह्न हैं,' यह कथन भी असङ्गत है। शुद्ध जातिका अर्थ क्या है ? क्या सृष्टिकालसे प्रकट होनेवाली कोई आदिम जातिको शुद्ध जाति कहा जाता है ? यदि हाँ, तो उपर्युक्त चिह्न उसीके हैं, इसमें क्या आधार है ? वानर आदि जातियोंके अङ्गोकी अस्पष्टताके कारण क्या उन्हें अशुद्ध माना जाय ? फिर शुद्ध बंदर कौन ? कोई जाति ही स्पष्ट अङ्गवालोकी होती है, कोई अस्पष्ट अङ्गवाली होती है। 'पाँचवी, छठी, सातवीं पीढ़ीमें अशुद्ध संतानोमें फिर शुद्धता आ जाती है,' इसका ठीक अर्थ न समझकर विद्वान् लेखकने व्यर्थ ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रके रक्तका हिसाब-किताब लगा डाला है। 'पाँचवी पीढ़ीमें अशुद्ध संतान शुद्ध हो जाती है,' इसका अभिप्राय यह नहीं है कि किसी तरहसे भी अशुद्ध संतानसे पाँचवीं पीढ़ीकी संतान शुद्ध हो जाती है। उसका अभिप्राय है कि शूद्रकन्याका ब्राह्मणके साथ विवाह हो और फिर उससे कन्या ही हो, उसका विवाह फिर ब्राह्मणसे ही हो, उससे फिर कन्या हो और उसका फिर ब्राह्मणसे ही विवाह हो । इस परम्परासे सातवीं पीढ़ीमें उत्पन्न कन्या ब्राह्मणी होगी । शूद्रकन्यामें ब्राह्मणसे उत्पन्न कन्यापरम्परासे ही सातवीं पीढ़ीमें जातिका उत्कर्ष होगा, परंतु शूद्रपुत्रकी परम्परामें उत्कर्ष नहीं हो सकेगा, बल्कि शूद्र यदि उत्कृष्ट वर्णकी कन्यासे उद्वाह करे तो उसका पतन हो सकता है। 'अतः हर तरहसे निकृष्ट संतान भी उत्कृष्ट जातिको प्राप्त हो जाती है,' ऐसा नहीं कहा जा सकता। 'रक्तमिश्रणसे भी जातिमे भेद नही होता,' यह बात नहीं है। प्राचीन कालमें स्त्रियाँ बिल्कुल शुद्ध थी, यह तो कोई भी नही कहता, किंतु जो अशुद्ध थीं, उनसे उत्पन्न संतान अनुलोम, प्रतिलोम सङ्कर कोटिमें गिनी गयीं, जो आज भी अनेक उपजातियोके रूपमें प्रत्यक्ष हैं। शुद्ध जातियोंमें वे मिलायी नहीं गयीं, यही वैदिकोंका कहना है। स्त्रियोंकी शुद्धिपर विश्वास न होनेका कारण भिन्न- भिन्न देशोंका वर्तमान वातावरण ही है। अब भी देखा जाता है कि माता, पिता, भ्राताके पूर्ण नियन्त्रणमें कन्या रहती है। वह नौ-दस वर्षकी अवस्थामें ब्याही जाती है। श्वशुरकुलमें जाते ही पर्देमें रहती है। ज्येष्ठ, श्वशुरतकसे भी नही बोलती, घरके भीतर सदा घूँघटकी आटमें रहती है। जहाँ घूँघटकी प्रथा नही है, वहाँ