भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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क्रिया तथा उचित नियन्त्रण बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता । इन्हीं तीनोकी साम्यावस्था प्रकृति है । भूतोत्पत्ति, अहंतत्त्व या महत्तत्त्वकी उत्पत्ति भी इनपर निर्भर है । प्रकृति उपादान है, इसीलिये हर एक विकृतिमें इनका अनु- स्यूत होना उचित ही है । ये सब परस्पर सम्बद्ध होते हैं, यह सांख्यका सिद्धान्त ही है— 'गुणानां सम्भूयार्थक्रियाकारित्वम् ।' गुण मिलकर ही क्रिया कर सकते हैं । गुण चल अर्थात् गतिशील होते हैं । 'चलं च गुणवृत्तम्' यह भी सांख्य-सिद्धान्त है । सत्त्व, रज, तम— तीनों ही गुणोंमें अङ्गाङ्गिभावकी विचित्रतासे ही विचित्र संसार बनता है— 'गुणानां विमर्दवैचित्र्यात् सर्गवैचित्र्यम् ।' यह सभी पौरस्त्य दार्शनिकोंके निश्चित सिद्धान्त हैं । इनमें मार्क्स या एंजिल्सका कोई भी नया आविष्कार नहीं । उन्होंने जो भी नयी बात कही वही असंगत तथा अप्रामाणिक है । जैसे 'प्रकृतिके पदार्थ और बाह्यरूप एक-दूसरेपर निर्भर हैं; एक दूसरेसे सजीवरूपसे सम्बद्ध हैं,' इत्यादि अंश अतिशयोक्तिपूर्ण हैं । यदि सभी सम्बद्ध हों तो सम्बन्धके भावाभावका कोई मूल्य ही नहीं रह जाता । फिर किसका क्या सम्बन्ध है, इस गवेषणाका भी कोई अर्थ नहीं रह जाता । फिर तो खपुष्प, वन्ध्यापुत्र, शशशृङ्गको भी सम्बद्ध ही कहना पड़ेगा । इसी तरह 'एक दूसरेकी रूप-रेखा निश्चित करते हैं', यह भी असंगत है । जड़भूत घटादिके समान स्वयं अपनेको ही नहीं जानते, फिर वे दूसरेकी रूप-रेखा क्या निश्चित करेंगे ? निश्चय आदि चेतनके धर्म हैं—'ईक्षतेर्नाशब्दम् ।' ( १।१।५ ) इस ब्रह्मसूत्रमें, जड़ प्रकृतिमें ईक्षणधर्म अनुपपन्न होनेसे उससे ईक्षणपूर्वक सृष्टिका निषेध किया है । जल, वायु, तेजकी प्रवृत्ति विचारपूर्वक नहीं होती । जैसे अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन सारथि-अश्वादिद्वारा अधिष्ठित होनेसे ही होती है, उसी तरह अचेतन वायु आदि भी स्वाधिष्ठाता चेतन देवतासे अधिष्ठित होनेसे प्रवृत्त होते हैं । किसी कार्यमें अवश्य ही अनेकों पार्श्ववर्त्ती कारण हुआ करते हैं । परंतु सभी पार्श्ववर्त्ती कारण हों, तब तो कार्य-कारणभावकी विशेषता ही नष्ट हो जायगी । अणु-परिमाण, पारिमाण्डल्य आदि किसीके प्रति भी कारण नहीं होते । किसी चोरी या हिंसाके अनेक पार्श्ववर्ती कारण होते हैं, तब केवल हिंसक या चोरको ही क्यों दण्ड दिया जाता है ? यह भी विचारणीय है । वस्तुतः शब्दाडम्बरके अतिरिक्त उपर्युक्त मार्क्सीय वादोंमें कोई तत्त्व नहीं । नवनवोन्मेष और विकासपर भी विचार आवश्यक है । उन्मेष या विकास विद्यमान वस्तुका ही होता है । कारण-सामग्री, आवरण,