मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० मार्क्सवाद और रामराज्य नियम बनने लगे और विवाह आदि चल पड़े, तब पंचायतों और मुखियोंका निर्माण हुआ; धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि अनेक प्रकारके नियम बनाये गये । इसी बीच खेतों तथा फलवान् वृक्षोंपर अधिकार प्राप्त करनेके लिये दो दलोंमें संग्राम होने लगे । संग्राममें जो लोग जीत गये, वे मालिक बन बैठे और जो हार गये, वे गुलाम बने । उसी समयसे मालिक और गुलामका जन्म हुआ और उनमें भेद, संघर्ष तथा विद्वेष उत्पन्न होने लगा। निजी सम्पत्तिकी प्रथा जबसे चली है, तभीसे दो दल तथा वर्ग परस्पर विरुद्ध रहने लगे थे । तबसे ही मनुष्यजातिका इतिहास वर्ग-कलहका इतिहास है । यह दूसरी बात है कि यह वर्ग- कलह कभी प्रत्यक्ष रहता है कभी अप्रत्यक्ष । इसके फलसे या तो नवीन सामाजिक प्रणाली, नवीन स्वामित्व प्रथा, नवीन आर्थिक नियमोंका जन्म होता है या दोनों वर्गोंका लड़ते-लड़ते नाश हो जाता है । ये दोनों दल भिन्न भिन्न स्वार्थ स्वामित्व- की प्रथा, आदर्श तथा सभ्यताके समर्थक होते हैं । शाश्वत नियम पर सिद्धान्ततः राज्यशक्तिको किसी भी धार्मिक, आध्यात्मिक नियन्त्रणमे ही रहना उचित है । अन्यथा अनियन्त्रित उच्छृङ्खल राज्यशक्ति राष्ट्रके लिये भीषण सिद्ध हो सकती है । 'बृहदारण्यक उपनिषद्' में कहा गया है कि 'धर्म क्षत्रका भी क्षत्र है', अर्थात् धर्मपर राजाका शासन नहीं चलता, अपितु राजापर धर्मका शासन चलता है । जैसे बिना नकेलके ऊँट, बिना लगामके घोड़ा, बिना ब्रेकके साइकिल- मोटर आदि खतरनाक होते हैं, वैसे ही बिना नियन्त्रणके निरङ्कुश राज्यशक्ति देशके लिये अभिशाप सिद्ध हो सकती है । इसीलिये आज भी कुछ शासनके नियम और परम्पराएँ हैं ही तथा शासनोंको उनका नियन्त्रण मानना ही पड़ता है। ऐसी स्थितिमें राज्यशक्तिको धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक परम्परागत नियमोंके उल्लङ्घन करनेका अधिकार कथमपि नहीं है । भारतीय सभ्यतामें धर्म ब्रह्मके द्रष्टा सांसारिक भावोंसे अतीत होते हैं । प्रियान्न सम्भवेद् दुःखमप्रियादधिकं भवेत् । ताभ्यां हि ये वियुज्यन्ते नमस्तेषां महात्मनाम् ॥ (वाल्मी० रामा० सुन्दर० २६ । ४६) जो प्रिय-अप्रिय दोनोंसे अतीत हैं, उन्हें ही नमनीय महात्मा कहा गया है । वे लोग भी ऋतम्भरा प्रज्ञा एवं अपौरुषेय शास्त्रोंका आदर करते हैं । कुछ लोगोंका कहना है कि विभिन्न देश-काल और परिस्थितिके अनुसार विभिन्न महापुरुषोंद्वारा राष्ट्रके धारण पोषणानुकूल निर्धारित नियम-समूह ही शास्त्र है। परंतु यह सर्वथा अनिश्चित एवं अव्यवस्थित है। क्रियामें विकल्प हो सकता है, परंतु वस्तुमे विकल्प नहीं हो सकता । एक वस्तुके विषयमें एक ही ज्ञान यथार्थ