भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२६२ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् । धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥ ( महाभा० उद्योग० ३३ । ६० ) रामराज्यकी अर्थनीतिमें उपार्जन और उपयोग दोनों ही धर्मनियन्त्रित होते हैं। पर्वत खनन जैसे अति क्लेशसे होनेवाले स्वल्प लाभको तथा धर्मातिक्रमण- जन्य लाभको एव शत्रुचरणचुम्बनसे होनेवाले लाभको हेय समझना ही उचित है— अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा । अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म , तेषु मनः कृथाः ॥ ( महा० उद्योग० ३९ । ७७ ) दूसरोको बिना संताप पहुँचाये, सद्धर्मका अतिक्रमण बिना किये, खलोंके द्वारोपर बिना घुटना टेके मिलनेवाले स्वल्प लाभको भी बहुत समझना चाहिये । अकृत्वा परसंतापमगत्वा खलमन्दिरम् । अनुल्लङ्घ्य सतां वर्त्म यत्स्वल्पमपि तद्बहु ॥ ( शार्ङ्ग० पद्ध० स० १ ) ईमानदारीकी कमाईसे सुख-शान्ति एवं समृद्धि होती है । प्रसिद्ध है कि ईमानदारीका धन पानीमें नहीं डूबता, आगमें नहीं जलता और चोरके पेटमें नहीं हजम होता । उसीसे बरकत भी होती है । वंश-वृद्धि भी उसीसे होती है । बेईमानीसे भले ही तत्काल बडा लाभ हो, पर वह टिकाऊ नहीं होता । उलटे सुख समृद्धि लेकर चला जाता है । वशवृद्धिके अनुकूल भी नहीं होता । न्यायार्जित धनमें भी टैक्स आदिका खर्च निकालकर अतिरिक्त आयमें पञ्चधा विभाग करके ही यथोचित उपयोग करना ठीक होता है । प्रथम विभाग धर्मार्थ राष्ट्रके हितमें व्यय किया जाय, द्वितीय भाग यशके लिये राष्ट्रमे व्यय किया जाय, तृतीय भाग अर्थार्जन या मूल सम्पत्ति-रक्षणके काममें लाया जाय और चतुर्थ भाग अपने काममें लगाया जाय । पाँचवाँ भाग कुटुम्बी, नौकर, मजदूर आदि स्वजनोंके काममे लगाया जाय । पाँच हिस्सामें एक हिस्सा अपने काममें लगानेकी अनुमति है, परंतु उसमे भी नियन्त्रण है कि जितनेमें पेट भरे, तन ढके, उतने- हीमें ममत्व उचित है। अधिकमें ममत्व करना चौर्य है, उसे दण्ड मिलना चाहिये । इस तरह पाँच हिस्सेमें चार हिस्सा राष्ट्रहितके काममे आता ही है। एक हिस्सेमे भी यथावश्यक अपने उपयोगमें लगाना उचित है । तथाकथित राष्ट्रीकरणमें राष्ट्रकी भूमि, सम्पत्ति, कल-कारखानो, उद्योग- धंधोका सरकारीकरण हो जाता है । व्यक्ति शासनयन्त्रका नगण्य कलपुर्जे बन जाता है । शासनयन्त्र किसी दल या दलके तानाशाहोके हाथका कठपुतला बन जाता है । ऐसी तथाकथित सरकारें बिना नकेलके ऊँट, बिना लगामके घोडे, बिना ब्रेकके मोटर, अथवा बिना ड्राइवरके स्टार्ट की हुई मोटरके समान खतरनाक हो