मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ मार्क्सवाद और रामराज्य शोषकोंको न मिटाकर शोषण-वृत्ति मिटाना शासनका उद्देश्य है । दण्ड-विधानका भी उद्देश्य बदला चुकाना आदि न होकर अपराधीकी अन्तरात्मशुद्धि ही मुख्य उद्देश्य रक्खा गया था। शोषणवृत्ति बिना मिटाये शोषितोंमें ही शोषक उत्पन्न होते रहेगे। अत्यन्त गरीब, मजदूर या कँगले भी अधिकार पाकर शोषक हुए हैं एवं हो सकते हैं। धार्मिक भावनावाले दिलीप-जैसे महासम्राट् भी एक गाय- की रक्षाके लिये अपने प्राण दे सकते हैं, शिबि-जैसे सम्राट् भी एक कबूतरके प्राण बचानेके लिये अपने देहका सम्पूर्ण मास दे सकते हैं। साथ ही यह भी विचारणीय है कि क्या कोई मनुष्य स्वभावसे ही शोषक होता है या उसमें शोषणकी बुराई आगन्तुक है ? यदि बुराई या शोषण कोयले मे कालापनके समान स्वाभाविक है तब तो अवश्य जैसे कितना ही साबुनसे धोनेपर बिना कोयलाके मिटे उसका कालापन नही मिट सकता, वैसे ही शोषक मनुष्यके मिटे बिना उससे शोषण या बुराई नहीं मिट सकती । परंतु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं। स्वभावसे प्राणी बुरा या शोषक नहीं होता । यह कह चुके हैं कि कभीका शोषक ही पोषक बन जाता है तथा कभीका पोषक ही शोषक बन जाता है। शास्त्रीय सस्कार, सत्समागम एव धर्मनिष्ठाके विस्तारसे प्राणी पोषक बनता है । अधर्म, प्रमाद, स्वार्थपरता बढनेपर पोषक भी शोषक बन जाता है । वाल्मीकि पहले शोषक थे, पर वे ही सत्समागमसे महर्षि एव विश्वपोषक बन गये । अजामिल जो पहले साधु पुरुष थे, दुस्सगसे शोषक हो गये, फिर कालान्तरमे वे ठीक हो गये। रामराज्यके सिद्धान्तानुसार प्राणिमात्र ईश्वरके अश, अविनाशी, चेतन, अमल, सहज सुखराशि है—ईस्वर अस जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी॥ वेद भी कहते हैं—'अमृतस्य पुत्राः' प्राणिमात्र अमृत—परमेश्वरके पुत्र हैं। जैसे गङ्गाका तरङ्ग गङ्गाजलके तुल्य ही शीतल, मधुर और पवित्र होता है, वैसे ही चेतन, अमल, सहज, सुखराशि परमेश्वरकी सतान भी चेतन, अमल, सहज- सुखराशि ही हैं। उनमें बुराई, अविद्या, काम कर्मके सम्पर्कसे आयी— भूमि परत भा ढावर पानी । जिमि जीवहि माया लपटानी ॥ जैसे निर्मल जलमें भूमिके सम्पर्कसे मलिनता आ जाती है, वैसे ही माया आदिके सम्पर्कसे जीवमें मलिनता आ जाती है। जैसे मलिन जलमें निर्मली बूटी या फिटकिरी डालनेसे जलमें निर्मलता आ जाती है, वैसे ही स्वधर्मानुष्ठान एवं ईश्वरभक्तिसे जीवकी मलिनता, बुराइयाँ दूर हो जाती हैं, फिर वह शोषक नहीं रह जाता, शुद्ध पोषक हो जाता है। असलमें मात्स्यन्याय दूर होनेके लिये ही शासनकी स्थापना हुई है। धर्म, सदाचारका विस्तार, सत्य, अहिंसाकी प्रतिष्ठा तथा दण्डके द्वारा शोषण मिटाकर समन्वय, सामञ्जस्य स्थापित करना ही शासनका मुख्य लक्ष्य है । वस्तुतः मार्क्स- . वादी स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातृताकी बात तो करते हैं, परंतु उन्हें समानता,