मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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(पृथ्वी) रूप अङ्कुरसे जलरूपी बीजका पता लगता है, जलरूपी अङ्कुरसे तेजरूपी मूलका पता लगता है, वैसे ही तेजरूपी अङ्कुरसे सदरूपी मूलका पता लगता है—'तेजसा सौम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ ।' दार्शनिक पण्डितोंके इन तत्त्वविचारोंको गलत कहना बुद्धिकी अजीर्णताका ही द्योतक है । वास्तविक अभिज्ञता और व्यावहारिक ज्ञानसे तो भौतिकवादियोंने ही शत्रुता कर रक्खी है । विश्वके उपादानकारणरूपसे, विश्वके निमित्तकारणरूपसे, विश्वके आधार या अधिष्ठानरूपसे, विश्वके प्रकाशक तथा व्यवस्थापकरूपसे, कर्मफलदातारूपसे, सर्वशासकरूपसे ईश्वरकी सिद्धि होती ही है । जैसे दर्पणके अंदर प्रतिबिम्ब भासित होता है, वैसे ही अनन्त चिद्रूप दर्पणमें मनुष्य, पश्वादि, जङ्गम-स्थावरादि सभी प्रपञ्च भासित होते हैं । काष्ठपर व्यक्त अग्निको काष्ठसे भिन्न समझना ही पड़ेगा, ज्ञान या चेतनाको मनुष्यादि देहोंसे भिन्न समझना ही पड़ेगा । आदिम जंगली मनुष्योंके वस्तु और चेतनासम्बन्धी विचारोंको इतिहासके बलसे सिद्ध करनेकी दुश्चेष्टा निराधार है । यह इतिहास कपोलकल्पित, मिथ्या एव पूरा मनगढन्त है । जड़वादियोंका इतिहास-सम्बन्धी मनोराज्य केवल विनोदका विषय है । कोई प्रमाणचक्षु पुरुष इसे केवल भौतिकवादियोंका दिमागी फितूर ही कहेगा । प्रामाणिक आस्तिकोंके इतिहासोंके अनुसार तो विश्वकारण ईश्वरकी संताने ईश्वरीय ज्ञानरूप वेदादि शास्त्रोंद्वारा पूर्णरूपसे शिक्षित ही होती हैं । उत्तरोत्तर जहाँ-कहीं सच्छिक्षा एवं सत्सङ्गमे विच्छेद हुआ, वहीं असभ्यता, अज्ञता एवं मिथ्या धारणाएँ बनती हैं । भौतिकवादियोंकी यह धारणा नितान्त असत्य है कि 'अध्यात्मवादियोंकी अतिभौतिक देवता, ईश्वर या ब्रह्म इत्यादि कल्पनाएँ हैं और इनका मूल असभ्यो, जंगलियोंकी तन्त्र-मन्त्र, भूत प्रेतकी कल्पनाएँ है ।' जिन्होंने सच्चे इतिहासोंका अध्ययन किया है, रामायण, महाभारत, पुराणों, उप- पुराणों, तन्त्रों, आगमों एवं मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदो एवं उनके आरण्यक, उपनिषदों- का मनन किया है और जिन्होने व्यास, वसिष्ठ एवं श्रीकृष्ण भगवान्के दिव्य दर्शनोंका अध्ययन किया है, उनको यह समझनेमें कठिनाई न होगी । भौतिक- वादी जिन बाह्य भौतिक वस्तुओंको सत्य मानते हैं, देवता, ईश्वर, ब्रह्मकी बात तो पृथक् रहे भूत-प्रेतकी कल्पना भी उनसे अधिक सत्य है । इसीलिये उपनिषद् या गीताके जिस निर्गुण ब्रह्मको भौतिकवादी अन्तिम कल्पना मानते हैं, उस कल्पनाके साथ भी भूत-प्रेत एवं देवताओंकी कल्पनाएँ हैं । यह समझना नितान्त भ्रम है कि विकासक्रमसे भिन्न-भिन्न कालोकी ही यह कल्पनाएँ हैं । एक उच्च- कोटिका ब्रह्मदर्शन परमार्थ-दृष्टिमें सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य ब्रह्मतत्त्व बतलाता है । परंतु वही अन्य अधिकारियोंके लिये ईश्वरकी उपासना बतलाता है । कुछ और ढंगके अधिकारियोंके लिये सगुण ईश्वरकी आराधना, अन्य लोगोंके लिये विभिन्न देवताओंकी आराधना बतलाता है । अन्य ढंग-