मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशारीरिक बलमें या मस्तिष्कके कामोंमें अधिक सफलता प्राप्त कर सकता है, तो स्त्रीका महत्त्व पुरुषको उत्पन्न करनेमे कम नही है। पुरुष-समाजका जीवन स्त्री के बिना सम्भव नहीं, इसलिये पुरुषकी सम्पत्ति होकर भी स्त्री पुरुषके बराबर ही आसनपर बैठती रही है। "मार्क्सवादमें स्त्री-पुरुष-सदाचारका चाहे कितनी भी लीपा-पोतीके साथ महत्त्व गाया जाय, परन्तु यह प्रश्न प्रमुखरूपसे बना ही रहेगा कि 'क्या एक गिलास पानीके लिये गलेमें बाल्टी बाँधकर घूमते रहें ? कहीं भी गिलासभर पानी मिल सकता है।' व्यक्ति एव परिवारका समूह ही समाज है और स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध परिवार और समाजका केन्द्र है। समाजमें सम्पत्ति-विपत्तिका कारण बहुत प्रकारके रद्दोबदल होते रहते हैं, फिर भी बहुत-से धार्मिक-सामाजिक नियम प्राकृतिक नियमो- के समान सुस्थिर होते हैं।" मार्क्सवादियोंकी ऐतिहासिक कल्पनाएँ सर्वथा निराधार है। जगत्-प्रपञ्च निरीश्वर नहीं है। सर्वज्ञ ईश्वरकी सृष्टि लावारिस एवं निर्विवेक भी नही थी। आदिम कालके ब्रह्मा, वशिष्ठ, अत्रि, अङ्गिरा, भृगु, बृहस्पति, शुक्र आदि आधु- निक लोगोंकी अपेक्षा कही अधिक बुद्धिमान् और बलवान् थे। स्वार्थ मूलक सघर्ष जैसे आज चलता है, वैसे ही कभी पहले भी चलता था। कठिन अवसरोंपर स्त्रियाँ भी लडाईमें शामिल होती थीं। इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है दुर्गाके अनेक अवतारों—महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि द्वारा मधुकैटभ, महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ, चण्ड, मुण्ड, धूम्रलोचनादि दानवोंका सहार। पत्नी- रूपमें नारी पुरुषकी भोग्या है, परन्तु माताके रूपमें वही पुत्रकी पूज्या है। शृङ्गार- रसके लिये नारी कोमलाङ्गी है, परंतु प्रचण्ड दैत्य-दर्प-दलनमें वही भीषण कराल कालिका है। भगवतीकी यह गर्जना मार्क्सवादियोने कभी नहीं सुनी कि जो मुझे सग्राममे जीत ले, जो मेरा दर्प दूर कर सके और जो मेरे समान बलवान् हो, वही मेरा भर्त्ता हो सकता है—'यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति । यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥' (दुर्गासप्त० ५। १२०) नारी सदासे ही शक्तिकी प्रतीक रही है और पुरुष शिवका प्रतीक रहा है। उसका ही रामके साथ सीतारूपमें, विष्णुके साथ लक्ष्मीरूपमें, ब्रह्माके साथ सरस्वतीरूपमें और कृष्णके साथ राधा, रुक्मिणीके रूपमे आदर होता रहा है। वह रणाङ्गणमे प्रचण्डरूप धारिणी होने- पर भी शिवके विश्राम एवं विनोदके लिये 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' की प्रतिमा बन- कर परम कोमलाङ्गी एवं रक्षिणीरूपमें व्यक्त होती थी। वह साझेकी सम्पत्ति कभी नहीं रही। वह सदा ही गृहस्वामिनी एवं गृहलक्ष्मी रही है। द्रौपदी, मारिषाका उदाहरण विशेष वर-शापमूलक अपवादस्वरूप घटनाएँ हैं। वे आचारमें प्रमाण नहीं हैं। आचारमे उदाहरणका आदर न होकर विधि (कॉस्टि-