मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 342, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंकी, पुत्रोंकी पूज्या महारानी होकर गृहस्वामिनी, गृहलक्ष्मी बनना श्रेष्ठ है या सर- कारी नौकरानी बनकर बिल्ली-कुतियाका जीवन व्यतीत करना श्रेष्ठ है, इसे समझ- दार स्त्रियाँ स्वयं सोचें और सोचें वे पुरुष जिन्हें आगेसे ऐसी ही पत्नी और माता पाना है। व्यभिचारका उन्मूलन मार्क्स लिखता है कि 'हम स्त्रीको पुरुषकी सम्पत्ति बनाने और धर्मके भयसे जकड़ देनेके पक्षमें नहीं हैं। यह भी हमें स्वीकार नहीं है कि एक सन्तान उत्पन्न करनेके लिये किसी स्त्रीका एक पुरुष-विशेषकी दासी या सम्पत्ति बन जाना जरूरी है। वह स्त्री-पुरुषके सम्बन्धको स्त्री-पुरुषकी शारीरिक आवश्य- कताका सम्बन्ध मानता है; परंतु इसके लिये वह दोनोंमेंसे एक-दूसरेका दास बन जाना आवश्यक नहीं समझता। इस सम्बन्धमें वह कानूनके भी दखल देनेकी जरूरत नहीं समझता, परंतु इसके साथ ही वह स्त्री-पुरुषके सम्बन्धकी उच्छृङ्खलताको भी स्वीकार नहीं करता। किसी स्त्री या पुरुषका दूसरोंके शारीरिक भोगके लिये अपने शरीरको किरायेपर चढ़ाना वह अपराध समझता है। समाजवादी और समष्टि वादी समाजमें जीविकाके साधन अपनी योग्यता और अवस्थाके अनुसार सभीको प्राप्त होंगे, इसलिये जीविकाके लिये व्यभिचारसे धन कमानेकी आवश्यकता हो नहीं सकती और जो लोग पूँजीवादी-समाजके संस्कारोंके कारण ऐसा करेंगे, वे अपराधी होंगे। संक्षेपमें स्त्री-पुरुष और विवाहके सम्बन्धमें मार्क्सवाद समाजके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्यके विचारसे पूर्ण स्वतन्त्रता देता है, परंतु उच्छृङ्खलता, गड़बड़ या भोगको पेशा बना लेनेको और इसके साथ ही अपने भोगकी इच्छाके लिये दूसरे व्यक्तियो और समाजकी जीवन-व्यवस्था में अड़चन डालनेको वह भयंकर अपराध समझता है। स्त्री पुरुषके सम्बन्धमें मार्क्सवादका रुख लेनिनकी एक बातसे स्पष्ट हो जाता है। लेनिनने कहा था—स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध शरीरकी दूसरी आवश्यकताओं—भूख, प्यास, नींद—की तरह ही एक आवश्यकता है। इसमें मनुष्यको स्वतन्त्रता होनी चाहिये, परंतु प्यास लगनेपर शहरकी गंदी नालीमें मुँह डालकर पानी पीना उचित नहीं। उचित है स्वच्छ जल, स्वच्छ गिलाससे पीना। स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध मनुष्योंकी शारीरिक, मानसिक- तृप्ति और समाजकी रक्षाके लिये होना चाहिये न कि स्त्री पुरुषोंको रोग और कलहका घर बना देनेके लिये। अबतकके पारिवारिक और विवाह सम्बन्धी बन्धन पूँजीवादी आर्थिक सगठनपर कायम हैं, जिनमें स्त्रीका निरन्तर शोषण होता रहा है; इसलिये अब समाजको इसे बदलकर स्त्री-पुरुषकी समानतापर लाना चाहिये।' यह सही है कि मार्क्सवादमें जीविकाके लिये स्त्रियोंको व्यभिचार न करना पड़ेगा, परंतु काम-प्रेरणासे होनेवाले व्यभिचारपर मार्क्सवादमें क्या रोक है ?