भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 345

तेज, रसतन्मात्रासे जल तथा गन्धतन्मात्रासे पृथिवीकी उत्पत्ति होती है । यह स्पष्ट है कि जिन भूतोंमें केवल शब्द है, वह सूक्ष्म आकाश है । वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुणोंका उपलम्भ होता है। वह आकाशकी अपेक्षा स्थूल है । उत्तरोत्तर रूप, रस, गन्ध गुणोंकी जैसे-जैसे अधिकता होती है, वैसे ही तेज आदिमें स्थूलता उपलब्ध होती है । इस दृष्टिसे शब्दस्पर्शात्मक ही भूत है । उपनिषदोंके अनुसार सत्‌से आकाशादिकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाशादिकी सत्ताका व्यवहार होता है । कारणसे कार्य उत्पन्न होनेपर मायाद्वारा प्रधान कारणकी अप्रधानता तथा अप्रधान कार्यकी प्रधानता हो जाती है इसीलिये कार्य विशेष्य हो जाता है, कारण विशेषण हो जाता है । इसी कारण आकाशकी सत्ता, घटकी मृत्तिका, पटका तन्तु आदिका व्यवहार होता है। हर जगह शक्तिसे ही कार्य उत्पन्न होता है, मृत्तिकामें घट-शक्ति होती है, बीजमें अङ्कुर-शक्ति होती है। ऐसे ही सम्पूर्ण कार्योंके उत्पादनानुकूल उन-उन कारणोंमें शक्तियाँ रहती हैं, इस दृष्टिसे सत्‌में प्रपञ्चोत्पादिनी शक्ति रहती है । उसी सत्-शक्तिसे भूतोंकी उत्पत्ति होती है । सूक्ष्मरूपसे स्थूल भिन्न नहीं होता । सूक्ष्म कारण है, स्थूल कार्य है, यह कहा जा चुका है । घट कपालमात्र है, कपाल चूर्णरूप है, वह भी रजोमात्रा है । रज भी परमाणु रह जाता है । मृत्तिकासे भिन्न घट नहीं होता, रससे भिन्न जल नहीं, रूपसे भिन्न तेज नहीं । ऐसे ही धारसे भिन्न तलवार नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता । उसी तरह सुतलीसे भिन्न होकर सच्छिद्र जाल नहीं है; परन्तु जालसे भिन्न होकर सुतली नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता; अतः विषम दृष्टान्त है । गति पदार्थकी आवश्यकता है, अवस्था अवस्थावान्‌से भिन्न नहीं । नाप तौल तथा मार्क्सवादियोंका प्रयोग भी बिना ज्ञानके नहीं होता है, अतः प्रयोगवादको भी सर्वकारण परममूलका अन्वेषण तो करना ही चाहिये । क्या मनुष्यकी इच्छाशक्ति स्वाधीन है ? ‘मनुष्यकी इच्छा स्वतन्त्र है या नहीं', यह दार्शनिक क्षेत्रमें एक प्राचीन प्रश्न है । द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी इसका उत्तर देते हैं—"नहीं, इस प्रश्नका मूल भी धर्मविद्यामें है । यदि मनुष्यका कर्म उसकी स्वेच्छासे नहीं है तो वह पाप-पुण्यके भारसे मुक्त हो जाता है तथा स्वर्ग और नरकका कोई अर्थ नहीं रह जाता । यही कारण है कि धर्म-विद्या मनुष्यकी इच्छाको स्वतन्त्र मानती है । “इस प्रश्नका यों विचार कीजिये । सारा संसार कार्य-कारणके नियमसे बँधा हुआ है । क्या मनुष्य इस संसारका अंश नहीं ? केवलमात्र मनुष्यकी इच्छा ही क्या इस प्राकृतिक नियमसे परे है ? सब वस्तुओंकी तरह मनुष्यकी इच्छा भी कारणजनित है । उसकी इच्छाके प्राकृतिक तथा सामाजिक कारण हैं । मनुष्य ऐसा सोचता अवश्य है कि वह अपनी इच्छानुसार ही सब कुछ करता है।

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन) · पृष्ठ 345, कुल 866 में से · BharatKosha