मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशम परिच्छेद मार्क्स और ज्ञान ( मार्क्सीय मन या ज्ञानपर विचार ) ( १ ) मन और शरीर मोरिस कॉर्न फोर्थकी ‘दि थ्योरी आफ नालेज’में कहा गया है कि— “मन शरीरसे विभाज्य नहीं है। मानसिक क्रियाएँ मस्तिष्ककी क्रियाएँ हैं। मस्तिष्क प्राणीके बाह्य जगत्के साथ रहनेवाले जटिलतम सम्बन्धोंका अवयव है। वस्तुओंकी प्रत्यात्मिका जानकारी ( Conscious, awareness ) का प्रथम रूप ‘सेंसेशन’ ( Sensation ) अनुभूति है, जो प्रतिनियत सहज प्रति- क्रियाओ; ‘कण्डीशण्ड रिफ्लेक्सेज़’ ( Conditioned reflexes ) के विकाससे उत्पन्न होता है। अनुभूतियाँ ( सेसेशन ) प्राणीके लिये बाह्य-जगत्के साथ उसका जो सम्बन्ध है, उसके सकेतोंकी एक पद्धति निर्मित करती हैं। मनुष्यमें एक द्वितीय संकेतपद्धति विकसित हो गयी है—वाणी ! यह काल्पनिक ( भावप्रधान ) [ ऐब्स्ट्रेक्टिंग ] और साधारणीकरणके कार्य करती है और इसी वाणीसे सम्पूर्ण उच्चतर मानसिक जीवन बढ़ चलता है, जो कि मनुष्य प्राणीकी निजी विशेषता है। मानसिक प्रक्रियाओंकी अनिवार्य बात यह है कि उन्हीं गतिविधियोंके भीतर और उन्हींके द्वारा प्राणी अपने चारों ओरके वातावरणके साथ जटिल और विभिन्न सम्बन्ध अनवरत बनाता रहता है । इसलिये प्रत्ययोंकी प्रक्रियाएँ वास्तवमें बाह्य जड़ ( मेटोरियल ) सत्यको प्रतिबिम्बित करनेवाली प्रक्रियाएँ हैं। मस्तिष्ककी जीवन प्रक्रियामें जड ( भौतिक ) जगत्का प्रतिबिम्ब ही ‘प्रत्यय’ ( कौन्शसनेस ) है।”