मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स और ज्ञान ६२३
स्वयं अप्रकाशित रहकर ही विश्वको प्रकाशित करेगा या आलोकादिके तुल्य सजातीय प्रकाशान्तर निरपेक्ष प्रकाशमान होकर विषयका प्रकाशक होगा ?” पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि चक्षु तो स्वातिरिक्त अनुभवका जनक होता है। इस तरह अनुभव स्वातिरिक्त अनुभवका जनक नहीं है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभव सजातीय अनुभवान्तरकी अपेक्षा न करके ही प्रकाशमान होता है । इस तरह स्फुरण लक्षणयुक्त होनेसे अनुभव ही चित्प्रकाश सिद्ध हो जाता है । यद्यपि अनुभव, चक्षु तथा आलोक—तीनो ही घटादिके व्यञ्जक हैं तथापि अनुभव विषयाज्ञानका विरोधी होनेसे चित्प्रकाशरूप है । आलोक विषयगत तमका विरोधी होनेसे जड़ प्रकाशस्वरूप है और चक्षु अपरोक्ष अनुभवका साक्षात् साधन होनेसे अज्ञात कारण है । इसपर भी कहा जाता है कि 'आलोकके तुल्य अनुभव सजातीय प्रकाशानपेक्ष है।' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि आलोक भी अपने प्रकाशके लिये सजातीय चक्षुकी अपेक्षा रखता ही है, कारण आलोक स्वतः तमसे रहित है, अतः चक्षुका तमके निवारणमे उपयोग नहीं है । हाँ, चक्षुर्जिन्य अनुभवके द्वारा आलोकका प्रकाश होता है । परंतु वह आलोकका विजातीय ही है, अतः आलोककी तरह सजातीयानपेक्ष अनुभवका चित्प्रकाशरूप होना ठीक है । यदि इस प्रकाशको जड़ माना जाय, तो जगत्में अन्धता-प्रसक्ति हो जायगी । प्रमातृ-चैतन्य ही जडानुभवबलसे सबका अवभासन करता है । यदि आत्म-चैतन्यका विषयके साथ सम्बन्धमात्रके लिये जडानुभवका उपयोग है, तब तो यह वेदान्तका ही मत है । वृत्तिरूप अनुभव सम्बन्धार्थ या आवरणाभिभवार्थ ही होता है । कुछ लोग आत्म-चैतन्यसे पृथक् ही विषयकी अभिव्यक्तिके लिये जडा- नुभवजन्य अनुभवान्तर मानते हैं; परंतु वह अनुभव भी यदि जड़ है तो उसे भी अन्य अनुभव अपेक्षित होगा । इस तरह अनवस्था होगी । 'आत्मा और अनुभव दोनों ही चित्प्रकाश हैं' यह पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस तरह आत्मा और अनुभव दोनों ही अन्योन्य-निरपेक्ष सिद्ध होंगे, फिर उनका सम्बन्ध किसके द्वारा विदित होगा ? दोनोंके ही अन्योन्यवार्ता- नभिज्ञ होनेके कारण दोनोंमेंसे कोई भी सम्बन्धग्राही नहीं हो सकता । कहा जा सकता है कि 'जैसे पुरुषान्तरका ज्ञान चिद्रूप होनेपर भी दूसरेको विदित नहीं होता, वैसे ही चिद्रूप होनेपर भी आत्मा स्वयं प्रकाशित नहीं होगा । इसलिये अनुभवाधीन ही आत्माकी सिद्धि होती है।' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि तब तो यही आपत्ति अनुभवके सम्बन्धमें भी हो सकती है । यदि कहा जाय कि 'पुरुषान्तर संवेदनव्यवहित होता है, किंतु अपना अनुभव अव्यवहित है, अतः स्वप्रकाश है,' तो आत्माके सम्बन्धमें भी यही कहा जा सकता है । आत्मा चिद्रूप एव अव्यवहित होनेसे अपने अनुभवके समान स्वयं ही प्रकाशित होता है।