भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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६५२ मार्क्सवाद और रामराज्य

खपुष्पमें भले ही अनुभाव्यत्व रहे, परंतु विशेषणभूत सत्त्व न होनेसे उसमें अनुभवत्व नहीं जायगा । अज्ञात घटमें भी अनुभवयोग्यता है ही । अनुभवितुं योग्य ही अनुभाव्य होता है, अतः उसमें भी अतिव्याप्ति न होगी । कुछ लोग कहते हैं कि 'जो वर्तमान दशामें स्वाश्रयके प्रति स्वसत्तासे ही स्वविषयका साधन है, वही अनुभूति है ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि विषय-साधनत्व विषय प्रकाशकत्व ही है । उसका भी अर्थ होगा विषय- प्रकाशजनकत्व । विषय-प्रकाश विषयानुभवरूप ही होगा । तथा च निष्कर्ष यह निकलेगा कि अनुभव-अनुभवका जनक है । यदि इन दोनों अनुभवोंकी एकता मान्य है, तब तो आत्माश्रय-दोष होगा । जैसे स्वयं देवदत्त अपनेसे उत्पन्न नहीं हो सकता, वैसे अनुभव भी अपनेसे ही उत्पन्न नहीं हो सकता । यदि दोनोंका भेद माना जाय तो द्वितीय अनुभवको प्रथमानुभवसे जन्य कहना पड़ेगा । परंतु प्रथमानुभव किससे उत्पन्न होगा ? यदि उसे विषयेन्द्रिय- सन्निकर्षसे जन्य मानें, तब तो द्वितीय अनुभवको भी उस सन्निकर्षसे जन्य मानना चाहिये । फिर उसे प्रथमानुभवसे जन्य क्यों माना जाय ? अतः 'अनुभव स्वविषय अनुभवका जनक है' यह कल्पना व्यर्थ ही है । 'अनुभव स्वाश्रयके प्रति स्वविषयका प्रकाशक है' इस तरह 'स्वाश्रयके प्रति' यह अंश भी व्यर्थ ही है; क्योंकि अनुभव किसीके आश्रित नहीं रहता । जो कहते हैं कि 'अनुभव आत्माके आश्रित रहता है', वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभव स्वयं ही तो आत्मा है । कुछ लोग कहते हैं कि 'अनुभविता ही आत्मा है, अनुभव नहीं', पर यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभव ही अनुभविता भी है । जैसे प्रकाशस्वरूप सविता ही प्रकाशक भी कहा जा सकता है, वैसे ही अनुभवस्वरूप आत्मा ही अनुभविता भी कहा जा सकता है । कहा जाता है कि 'सङ्कोचविकासशाली धर्मभूत नित्यद्रव्य आत्मस्वरूपसे भिन्न ही ज्ञान है ।' परंतु संकोचविकास साव- यव पदार्थका ही धर्म होता है । जो विकारी है, वह नित्यद्रव्य नहीं हो सकता । फिर इस पक्षमें यदि धर्मभूत ज्ञानद्रव्य स्वसत्तासे ही स्वविषयका प्रकाशक होता है, तो इसी तरह ज्ञानस्वरूप आत्मा भी स्वसत्तासे विषयप्रकाशक हो ही सकता है । वस्तुतस्तु शुद्ध बोध ब्रह्मस्वरूप ही है, अतएव वह निर्धर्मक ही है । अतएव उसमें अनुभवत्व, बोधत्वादि धर्मकी कल्पना व्यर्थ है । 'अनुभवका लक्षण क्या है ?' इस प्रश्नका उत्तर यही है कि अनुभवका स्वरूप लक्षण अनुभव ही है । यदि अनुभवका भी अन्य स्वरूप हो, तब तो उस स्वरूपका भी कोई अन्य स्वरूप होगा एवं उस स्वरूपका भी अन्य स्वरूप होगा, फिर अनवस्थाप्रसङ्ग अनिवार्य होगा । तटस्थ लक्षण अनुभवका वही है, जो ब्रह्मका है—'यतो वा इमानि भूतानि