भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 415

६५६ मार्क्सवाद और रामराज्य विशेषका अध्यास सामान्यमें ही होता है । अध्यासाभाव अधिष्ठानसे अनति- रिक्त अधिष्ठानरूप ही होता है । विशेषानुभवाभावरूप साक्षीका साक्षात्कार उपपन्न हो सकता है । अथवा यह भी कहा जा सकता है कि 'साक्षीका ही परिशेष रहना साक्षीका अनुभव है और सर्वद्वैतकी अप्रतीति होनेपर ही वह होता है।' यह भी कहा जा सकता है कि 'साक्षिस्वरूप ही साक्षीका साक्षात्कार है। जैसे राहुका शिर, आत्माका चैतन्य, सूर्यका प्रकाश आदि स्थानोंमें अभेदमें भी भेद-व्यवहार होता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये । इस तरह प्रत्यगभिन्न स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही नित्य अनुभव है।' कुछ लोग कहते है कि 'अनुभवका प्रागभाव अनुभवसे ही गृहीत होता है, अतः अनुभवको नित्य नहीं कहा जा सकता ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर प्रश्न होगा कि 'जिस किसी वस्तुका जिस किसीमे गृह्यमाण प्रागभाव होता है अथवा अगृह्यमाण भी प्रागभाव होता है ?' दूसरा पक्ष तो सर्वथा असङ्गत है, क्योकि इस तरह तो प्रमाणके बिना ही किसी वस्तुका अस्तित्व सिद्ध हो सकेगा । पहला पक्ष भी ठीक नही है, क्योंकि यहाँ विचारणीय यह है कि अनुभवका प्रागभाव अपनेसे ही ग्राह्य है या अन्यसे ? पहली बात ठीक नही; क्योकि पुत्रका प्रागभाव पितासे गृह्यमाण होता है, स्वयं पुत्र अपना प्रागभाव ग्रहण नही कर सकता । इसी तरह अनुभव स्वयं अपना प्रागभाव ग्रहण नहीं कर सकता । यदि अपने प्रागभाव-ग्रहणके समय अनुभव रहता है, तो उसका प्रागभाव कैसे कहा जा सकता है ? यदि स्वयं नहीं है, तो प्रागभावका ग्रहण किस तरह होगा ? स्वप्रागभाव अन्यसे गृहीत होना तो ठीक है, परंतु प्रकृतमे तो अनुभवसे भिन्न सब जड ही है। फिर जडसे अनुभव-प्रागभाव किस तरह गृहीत हो सकेगा ? 'अनुभवका प्रागभाव आत्मासे गृहीत होगा' यह भी नही कहा जा सकता; क्योकि आत्मा ही तो अनुभव है । कहा जाता है कि 'अनुभवके प्रागभावको अनुभव ग्रहण नही करता यह आपने कहीं देखा है या नहीं ?' पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि उसी आपके दर्शनसे अनुभवका प्रागभाव सिद्ध हो जायगा । अनुभवका अपने प्रागभावको ग्रहण न करना भी अनुभवका प्रागभाव ही है । उसका दर्शन आपको है ही । दूसरा पक्ष भी इसलिये ठीक नही है कि यदि आपने यह देखा ही नहीं, तो कैसे कह सकते हैं कि 'अनुभव अपने प्रागभावको ग्रहण नहीं करता ?' यदि अदृष्ट भी ग्राह्य हो, तब तो शशशृङ्ग भी ग्राह्य हो सकेगा ।' परंतु इस कथनमें कुछ सार नहीं है, क्योकि पुत्रका प्रागभाव पुत्र स्वयं ग्रहण नहीं करता । 'यह मैने देखा है' इससे स्वप्रागभाव अपनेसे गृहीत नही होता, यह व्याप्तिज्ञान होता है । इसी आधारपर यह कहना सङ्गत है कि 'अनुभव-प्रागभावको अनुभव नही ग्रहण कर सकता ।'