भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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मार्क्स और ज्ञान [पृ. ६७५]

कूटस्थ आत्मा भी अचेतनका प्रवर्त्तक वैसे ही होता है, जैसे अयस्कान्तमणि स्वयं प्रवृत्तिरहित होनेपर भी लोहका प्रवर्त्तक होता है या जैसे प्रवृत्तिरहित रूपादि चक्षुरादिके प्रवर्त्तक होते हैं। यद्यपि जैसे दुग्ध स्वयं वत्सवृद्ध्यर्थ प्रवृत्त होता है, जैसे जल अचेतन भी प्रवृत्त होता है, वैसे ही अचेतनकी प्रवृत्ति होनी ठीक है, तथापि वहाँ भी वत्सके चोषण तथा सर्वशासक अन्तर्यामीसे ही दुग्धादिकी प्रवृत्ति होती है। जैसे कर्त्ताके बिना कुठारादि करणोंका व्यापार नहीं बन सकता, वैसे ही देह, इन्द्रियादिका देहादिभिन्न कर्त्ताके बिना व्यापार नहीं हो सकता। भौतिक- वादी शरीरको चेतन कहता है। कहा जाता है कि 'जैसे नैयायिकके मुक्तात्मामें ज्ञान नहीं होता, वैसे ही मृत शरीरमे भी ज्ञानका अनुपलम्भ उपपन्न हो जाता है। प्रमाणके अभावसे ज्ञानका अभाव उपपन्न हो ही जाता है।' परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि यदि शरीर चेतन हो, तो बाल्य-यौवनादि भेदसे देहमें भेद सुस्पष्ट उपलब्ध होता है। फिर एक देह न होनेसे एक आत्मा भी नहीं होगा। फिर 'जिस मैंने बाल्यावस्था मे माताका अनुभव किया था, वही मै वृद्धावस्था मे पौत्रोका अनुभव करता हूँ' ऐसा अनुभव न होना चाहिये। बाल, स्थविर-शरीरमें भेद प्रत्यक्ष है। शरीरसम्बन्धी अवयवोंके उपचय-अपचयद्वारा शरीरका उत्पाद-विनाश सिद्ध है। जो कहा जाता है कि 'पूर्वशरीरोत्पन्न संस्कारसे द्वितीय शरीरमे संस्कार उत्पन्न होता है', तो यह ठीक नहीं। अनन्त संस्कारोंकी कल्पनामे गौरव होगा। यदि शरीर ही चेतन है, तब तो वह उत्पन्न होनेवाला शरीर नवीन ही है। फिर बालकोकी माताके स्तन्यपानमें प्रवृत्ति न होनी चाहिये, क्योकि इष्टसाधनता ज्ञान प्रवृत्तौ हेतु है। सद्यःसमुद्भूत शिशुको इष्टसाधनताका अनुभावक कुछ भी नहीं है। देहभिन्न आत्मा माननेवाले तो कह सकते हैं कि जन्मान्तरानुभूत इष्टसाधनताका स्मरण हो सकता है। परन्तु जहाँ देहभिन्न आत्मा नहीं है, वहाँ तो जन्मान्तरकी बात है ही नहीं। वहाँ स्तन्यपानमें जन्मान्तरीय इष्टसाधनताका ज्ञान नहीं कहा जा सकता। शङ्का हो सकती है कि 'यदि जन्मान्तरीय अनुभूत स्तन्यपानकी इष्टसाध- नताका स्मरण होता है, तो अन्य जन्मान्तरीय अनुभूत पदार्थोंका स्मरण क्यो नहीं होता?' तो इसका समाधान यह है कि उद्बोधक न होनेसे उनका स्मरण नहीं होता। स्तन्यपानके सम्बन्धमे तो जीवनका हेतुभूत अदृष्ट ही सस्कारका उद्बोधक है। यदि स्तन्यपानमें इष्टसाधनताका बोध होकर प्रवृत्ति न हो, तो जीवन ही असम्भव हो जायगा। कुछ लोग चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रियोको ही चेतन मानते हैं, परन्तु चक्षु आदिके उपघात होनेपर भी स्मृति होती है, अतः यदि चक्षुरादि इन्द्रियाँ चेतन होतीं, तो उनके उपघातमें स्मृति न होनी चाहिये थी। अन्यके अनुभूतका अन्य