भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 447

६८८ मार्क्सवाद और रामराज्य आवरण होता है । 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (गीता ५।१५) यह ज्ञानाभाव नहीं है; क्योकि ज्ञानाभाव जाननेके लिये उसके अनुयोगी (आधार) प्रतियोगी (ज्ञान) का ज्ञान होना चाहिये । जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी ( भूतलादि ) और प्रतियोगी ( घट ) का ज्ञान आवश्यक होता है । परंतु यहाँ यदि इसी तरह अनुयोगी- प्रतियोगीका ज्ञान हो तब ज्ञानाभाव कैसा ? और यदि उनका ज्ञान नहीं तो ज्ञानाभावका ज्ञान ही नही हो सकता । अतः भावरूप अज्ञान ही साक्षीके द्वारा प्रकाशित होता है । अज्ञानका उपलब्ध होनेसे ही तद्विरुद्ध ज्ञानका अभाव विदित हो जाता है । इसलिये इस अज्ञानको तम भी कहा जाता है । इसी तरह दिनो, पक्षो, मासो, वर्षो, युगो, कल्पो, अतीतो, अनागतोमें भेद है, परंतु उनके बोधोमें कोई भी भेद नहीं । एक अनन्त आकाशके तुल्य ही यह बोध भी अनन्त एवं एक ही है । अतः इसका न उदय होता है न अन्त । क्योकि उस बोधका प्रागभाव या उत्पत्ति अथवा विनाश भी बोधके बिना सिद्ध नहीं होता । यदि प्रागभाव-साधक बोध है, तो बोधका प्रागभाव ही कैसे कहा जा सकता है ? यदि बोध नहीं तो प्रागभाव सिद्ध ही कैसे होगा ? बोधोमें भेद नहीं होता, अतः अन्य बोधका प्रागभाव अन्य बोधसे सिद्ध होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता । इस तरह अत्यन्ताबाध्य होनेके कारण वही बोधस्वरूप भी है । यही संवित् आत्मस्वरूप भी है; क्योकि नित्य होकर स्वप्रकाश है । जो नित्य स्वप्रकाश नही वह आत्मा नहीं, जैसे घटादि । बोध नित्य एवं स्वप्रकाश है, अतः वही बोध, संवित्, अनुभव या ज्ञान आत्मा है । आत्मा परप्रेमास्पद है, अतः आनन्दस्वरूप भी है । ससारमें सर्वत्र ही प्रेम आत्माके लिये होता है, आत्मामें प्रेम अन्यके लिये नहीं होता । जैसे शर्कराके सम्बन्धसे अन्यत्र मिठास होती है, किंतु शर्करामें मिठास स्वतः होती है । उसी तरह आत्मामें प्रेम स्वतः होता है । अन्यत्र प्रेम आत्मसम्बन्धसे होता है । निद्रादि सब जिनसे अनुभूत होते हैं, उस अनुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता । अनुभूतिको अनुभाव्य माननेसे अनवस्था-दोष होता है, अतः अनुभूति अनुभाव्य हुए बिना ही स्वप्रकाश है । ज्ञाता और ज्ञानका दूसरा ज्ञान न होनेसे वे ज्ञेय नहीं होते । असत् होनेसे उन्हें अज्ञेय नहीं कहा जा सकता । निद्रा आनन्दादि साक्षी होनेसे उसे असत् नहीं कहा जा सकता ।