भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 503

७४८ मार्क्सवाद और रामराज्य आलय-विज्ञानवर्ती नील विज्ञान क्षण ही वासना परिपाकका हेतु होगा । इस तरह एक आलय संतानमें दो ही क्षण कारण होगे और कोई भी क्षण कारण नही होगा, परंतु होता है इसके विपरीत । अनेको वार नील विज्ञान होते ही हैं । यदि तदितर पूर्व ज्ञानोमें परिपाक हेतुता हो और उत्तरोत्तर आलय विज्ञानोमें प्रवृत्ति विज्ञान जनकता हो तो यह कैसे कहा जा सकता है कि क्षण भेदसे शक्तिभेद मान्य है । ऐसी स्थितिमें यदि विज्ञानवादी आलयविज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोका प्रवृत्ति विज्ञान जनन समर्थ तथा सभी तत्सतानवर्ती प्राक्तन नीलादि ज्ञान क्षणोको वासना परिपाकका हेतु मानता है तो समर्थमें कालक्षेप होता नहीं । अतः सदा ही नीलज्ञान होते रहना चाहिये साथ नीलज्ञानको कादाचित्क न होना चाहिये । इस प्रकार विचार करनेपर स्वसतान मात्राधीन होनेपर कादाचित्कत्वके विरुद्ध सदा सत्त्वकी प्राप्ति होती है । उससे नीलज्ञानका कादाचित्कत्व निवृत्त होगा, परंतु यह उपलब्धि विरुद्ध है । नीलज्ञानमें कादाचित्कत्व, उपलब्ध होता ही है । इसीलिये आलय विज्ञानसे अन्य वाह्यार्थ सापेक्ष होनेपर भी नीलज्ञानका कादाचित्क- त्व बन सकता है और तब जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते है वे तदतिरिक्त सापेक्ष होते हैं । इस प्रकार सौत्रान्तिकके द्वारा कथित व्याप्य व्यापकका व्याप्ति सम्बन्ध सिद्ध होता है । यदि कहा जाय कि नीलविज्ञान हेत्वन्तर अपेक्षा रख सकता है, पर वह हेत्वन्तर अन्य आश्रय-विज्ञान सतान ही हो सकता है बाह्यार्थ नहीं, परंतु यह ठीक नहीं, कारण कि विज्ञानवादी प्रवृत्ति विज्ञानोको सतानान्तर निबन्धन नही मानते । जिस समय चैत्रसतानमे गमन, वचन प्रतिभासप्रत्यय विच्छिन्न होते हैं उस समय मैत्र सतानमे रहनेवाले वचन, गमन प्रतिभास निमित्तक ही चैत्रमे गमनवचनादि गोचर प्रवृत्ति विज्ञान उत्पन्न होते हैं किंतु विवक्षु, जिगमिषु चैत्रमें होनेवाले गमन- वचन प्रतिभास चैत्र संतान हेतुक ही होते हैं । स्वसंतान हेतुक प्रवृत्ति विज्ञान माननेपर पूर्वोक्तरीतिसे नीलादिज्ञानका कादाचित्क नही बन सकता । अतः नीलादि- ज्ञानको वाह्यार्थ सापेक्ष मानना ही ठीक है । यदि प्रवृत्तिज्ञानको अन्यसतान निमित्तक माना जाय तो भी वह सत्त्वान्तर सतान भी तो सदा सन्निहित ही रहता है । अतः प्रवृत्तिविज्ञानोका कादाचित्कत्व बन नहीं सकता । क्योंकि चैत्रसंतानसे मैत्रसतानका देश तथा कालद्वारा विप्रकर्ष (दूरी) सम्भव नहीं है । इसमे यह कारण है कि विज्ञानवादीको विज्ञानसे भिन्न देशकालादि अमान्य ही होते हैं । अमूर्त होनेसे विज्ञानोको अदेशात्मक माना जाता है अतः देशकृत विप्रकर्ष नही हो सकता । इसी तरह विज्ञान संतानोंका कालकृत विप्रकर्ष भी नहीं हो सकता क्योकि सादिता दोष प्रसक्तिके डरसे विज्ञानवादी नवीन सत्त्वो (विज्ञानसतानरूप