मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर भी विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि 'यदि विज्ञान स्वभिन्न विज्ञानसे ग्राह्य होगा तो वह विज्ञान भी अन्य विज्ञानसे ग्राह्य होगा और इसी तरह अन्य ज्ञान भी इस प्रकार अनवस्था दोष होगा। साथ ही प्रदीपके समान ही विज्ञान भी अवभासात्मक ही है । जैसे प्रदीपका प्रदीपान्तरसे प्रकाश नहीं होता, क्योकि दोनो ही समानरूपसे अवभासात्मक हैं, वैसे एक ज्ञानका ज्ञानान्तर मानना भी व्यर्थ होगा । क्योकि समान होनेसे उनमें ग्राह्य-ग्राहकभाव सम्भव नहीं होगा । इसी दृष्टिसे यदि ज्ञान स्वातिरिक्त अर्थको ग्रहण करेगा तो वह स्वयं अप्रत्यक्ष रहकर अर्थको प्रत्यक्ष न करा सकेगा। चक्षु इन्द्रियके समान स्वयं विलीन, अतएव अप्रत्यक्ष ज्ञान अर्थभेदमें प्राकट्य आदि किसी भी विशेषताका आधान करनेमें समर्थ नहीं हो सकता । यदि चक्षुके समान अप्रकाशमान ही ज्ञान अर्थका बोधक होगा तो जैसे चक्षु ज्ञानोत्पादन- द्वारा अर्थ प्रकाशक होता है वैसे ही ज्ञान भी ज्ञानान्तरोत्पादनद्वारा वस्तुज्ञापक होगा । फिर इसी तरह ज्ञानजन्य ज्ञानकी भी ज्ञानान्तरोत्पादनद्वारा ही ज्ञापकता माननी होगी तथा च अनवस्था दोष होगा । अतः कहना पड़ेगा कि ज्ञानकी प्रत्यक्षता ही अर्थप्रत्यक्षता है । ज्ञानको ज्ञानान्तरोत्पादनकी आवश्यकता नहीं होती । वह ज्ञान भी यदि अन्य ज्ञानसे प्रत्यक्ष होगा तो अनवस्था दोष होगा । यदि वह स्वयं अप्रत्यक्ष होगा तो उससे अर्थका प्रत्यक्ष कैसे होगा ? इसीलिये कहा गया है कि— "अप्रत्यक्षोपलम्भस्यनार्थदृष्टिः प्रसिद्ध्यति" अर्थात् ज्ञानके अप्रत्यक्ष होनेपर अर्थज्ञान ही नही हो सकता है। यदि चक्षुके समान अप्रत्यक्ष ज्ञानसे ही अर्थ प्रत्यक्ष माना जायगा तब तो चक्षुके समान ज्ञानको अजन्य कहना पड़ेगा ? इसलिये अनावस्था दोषकी अपेक्षा स्वात्मवृत्तिका मान लेना अच्छा है। जैसे प्रदीप प्रदीपान्तरकी अपेक्षा नहीं करता वैसे ही ज्ञान भी ज्ञानान्तरकी अपेक्षा नहीं करता है" । उपर्युक्त विज्ञानवादी बौद्धका मत असंगत है । क्योकि विज्ञानग्राहक साक्षीको स्वीकार कर लेनेपर अनवस्था, आत्मवृत्तित्ता आदि समस्त दोषोका निराकरण हो जाता है । साक्षी और ज्ञान दोनोका चेतनत्व और जडत्वरूप स्वभाव विषम है। अतः उनमे उपलब्धृत्व तथा उपलभ्यत्व बन सकता है। साक्षी स्वयं सिद्ध होनेसे सर्वथा अप्रत्याख्येय है । ठीक है कि अप्रत्यक्ष ज्ञानसे अर्थप्रकाश नहीं बन सकता, परन्तु अन्तःकरण वृत्तिरूप ज्ञानका साक्षीके द्वारा प्रकाश मान्य है। तथा च आत्मचैतन्य साक्षीके द्वारा प्रकाशित वृत्तिरूप ज्ञानसे विषय प्रकाश सम्भव है । अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही उपलब्धा होता है । अन्तःकरण और विषयाकार वृत्ति तथा विषय सभी उसीसे प्रकाशित होते हैं । उपलब्धा उपलब्धिके द्वारा विषयका उपलम्भ या प्रकाश करता है । इन्द्रिय सन्निकर्षसे अन्तःकरणविकार विशेष वृत्ति उत्पन्न होती है । वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्ति और उसका विषय दोनों ही उपलब्धाको प्रत्यक्ष होते हैं । विषय अप्रकाश स्वभाव होनेके कारण प्रमाताके