मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५६ मार्क्सवाद और रामराज्य ज्ञानमें वैधर्म्य होनेसे ग्राह्य-ग्राहकभाव संभव है ही । हाँ, ज्ञानमें ग्राह्यता इसलिये नहीं है कि वह ग्राहकनिष्ठ क्रियाजन्य फलशाली नहीं है । ऐसी ग्राह्यता तो बाह्यार्थमें ही होती है । वही प्रमाताकी प्रमाक्रियासे जनितफल ( प्राकट्य ) शाली होता है । क्योकि बाह्यार्थ जड़ होता है । अतएव वह स्वाकार वृत्ति प्रतिबिम्बित चैतन्यसे प्रकाशित होता है । यद्यपि वृत्ति भी जड़ ही है तथापि वृत्ति तो उत्पन्न होते ही चैतन्य प्रति- बिम्बसे युक्त ही रहती है । अतः वहाँ प्रतिबिम्बरूप फलान्तर व्यर्थ ही है । यही वार्तिककारका कहना है कि जैसे आकाश वस्तुके स्वभावानुसार कुम्भ उत्पन्न होते ही आकाशसे पूर्ण होता है, वैसे वृत्तिरूप ज्ञान उत्पन्न होते ही स्वाभाविक आकाशकल्प साक्षी चैतन्यसे पूर्ण रहता है । इसीलिये ज्ञानबुद्धि परिणाम भूतज्ञानसे नही ज्ञात होता है । किंतु उसमें प्रमाताके प्रति स्वतः सिद्ध चित्प्रतिविम्बरूप प्राकट्य होता है । इसलिये उनकी ग्राह्यता बन जाती है । इसीलिये कहा गया है— ‘न संविदर्यते फलत्वात्’ अर्थात् संविद् स्वयं फल है, अतः वह अन्तःकरण वृत्ति- रूपज्ञानसे नही जानी जाती है । यद्यपि बाह्यार्थ भी प्रमाताके प्रतिग्राह्य हैं तथापि वृत्तिरूप संविद्के रहनेपर ही बाह्यार्थ प्रकट होता है । साथ ही संविद् भी प्रकट होती है । अर्थात् अविद्यावच्छिन्न जीव ही साक्षी है, वह व्यापक होनेसे विषय प्रदेशमे भी रहता है । अतः साक्षीका जैसे ज्ञानसे सम्बन्ध है वैसे ही विषयसे भी सम्बन्ध है ही । तथापि अन्तःकरणावच्छिन्न साक्षी अनावृत रहता है । परंतु विषयावच्छिन्न साक्षी आवृत रहता है । इसीलिये उसमें आवरण-भङ्गके लिये वृत्तिकी अपेक्षा रहती है । अतएव बाह्यार्थ तभी साक्षिरूप अनुभवसे प्रकट होता है जब कि विषयाकारान्तः करण वृत्तिरूप संविद् उत्पन्न होती है । क्योकि उसी वृत्तिसे आवरणभङ्गद्वारा साक्षीका प्राकट्य होता है । परंतु वह वृत्ति तो स्वप्रतिबिम्बित साक्षिस्वरूप अनुभवसे ही प्रकट होती है । निष्कर्ष यह है कि-साक्षिस्वरूप अनुभव यद्यपि सर्वव्यापी है तो भी अविद्यासे आवृत होनेके कारण वह प्रकट नही होता । जैसे निर्मल दर्पणमें मुख प्रतिबिम्बित होता है वैसे भास्वर स्वभाववाले अन्तःकरणमें ही उसकी अभिव्यक्ति होती है । अन्तःकरण वृत्ति भी भास्वर ही है, अतः विषयाकार वृत्तिपर भी स्वभावसे ही अभिव्यक्त होता है । इसीलिये वृत्ति भी स्वभावतः प्रकट होती है । परंतु बाह्यार्थ अन्तःकरणसे व्यवहित रहता है अतः स्वभावसे ही उसमें चैतन्यके अभिव्यञ्जन करनेकी क्षमता नहीं रहती है । यह देखा ही जाता है कि सम्बन्ध समान रहनेपर भी कोई व्यञ्जक होता है और कोई नहीं होता है । जैसे चाक्षुषी प्रमाके साथ समान सम्बन्ध रहनेपर भी वह रूपांदिका प्रकाश करती है, वायु आदिका प्रकाश नहीं करती । घट और दर्पणका मुखसन्निधान समानरूपसे रहनेपर भी घटपर मुखका प्रतिबिम्ब व्यक्त नहीं