मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुद्ध चैतन्यमें 'अहं' का प्रयोग निर्णय किया गया है। वैसे ही जहाँ भी अहमर्थकी व्यापकता सुनायी दे, वहाँ व्यापक चैतन्य ही 'अह' का अर्थ समझना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि 'अहंकारश्चाहं कर्तव्यश्च' इत्यादि स्थलोंमें महत्तत्त्वका कार्य और मन आदिका कारण अहन्तत्त्व लिया गया है । 'महत्तत्त्वाद्धिकुर्वाणाद्भ- गवद्वीर्यसंभवात् । क्रियाशक्तिरहंकारस्त्रिविधः समपद्यत' ( श्रीमद्भा० ३ । २६ । २३ ) इत्यादि वचनोंके अनुसार यह सात्त्विक, राजस, तामस—त्रिविध अहकार आत्मस्वरूप अहमर्थसे सर्वथा भिन्न है । यदि अहमर्थ और अहंकारमें भेद न माना जायगा, तब तो इसी तरह 'बुद्धिरव्यक्तमेव च' ( गीता १३ । ५ ) इस वचनमें भी विवाद खड़ा हो सकेगा । यहाँ 'बुद्धि' पद क्षेत्रान्तर्गत दृश्यविशेषके लिये आया है । परंतु यदि 'बुद्धि' शब्दसे संवित् ( स्वप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा ) का बोध हो, तब तो संवित्का भी क्षेत्रकोटिमें ही परिगणन होगा । अतः कहना होगा कि भले ही कहीं 'बुद्धि' और 'ज्ञान' पदसे संवित् या आत्मा कहा जाय, पर 'बुद्धिरव्यक्तमेव च' इस क्षेत्रस्वरूपके निरूपण-प्रसङ्गका 'बुद्धि' शब्द संवित्का बोधक नहीं है । ठीक इसी तरह क्षेत्रमें प्रयुक्त अहंकार शब्दका अर्थ आत्मा नहीं है; किंतु 'अहमात्मा गुडाकेश' ( गीता १० । २० ) इत्यादि स्थलोंका ही 'अह'पद आत्मा- का बोधक है । 'दम्भाहंकारसंयुक्ताः' ( गीता १७ । ५ ) इत्यादि स्थलोंमें 'अह' पदका प्रयोग देहमें, अहंबुद्धि और गर्वमें होता है । 'गर्वोऽभिमानोऽहंकारः' ( अमर० १ । ७ । २१ ) इस कोषसे भी मालूम होता है कि अहंकार शब्द केवल अहम