मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१८ मार्क्सवाद और रामराज्य भक्तिसे ईश्वर साकार भी होता है । उसीका हिरण्मय, ज्योतिर्मय आदि रूप उपनिषदोंमें वर्णित है। ईश्वरका ज्योतिर्मय आकार होनेपर भी वह आकार दिव्य है । अतः सामान्य चर्मचक्षुको उसका दर्शन भले ही न हो, परंतु उपासना और तपस्या- के द्वारा दिव्य दृष्टिसम्पन्न लोगोंको उसका दर्शन आज भी होता है और हो सकता है। विष्णु, शिव आदि उसीके रूप हैं। जो ईश्वर अनन्त ब्रह्माण्डका निर्माण कर सकता है, अनन्त निराकार एवं सूक्ष्मजीवोंको अनन्त देह देकर साकार बना देता है, वह क्या अपने लिये दिव्य देहका निर्माण नहीं कर सकता ? और साकार नहीं बन सकता ? वस्तुतः जैसे निराकार अग्नि भी साकार हो सकती है, जैसे स्पर्शादिविहीन आकाश ही स्पर्शादियुक्त तेज-जलादि रूपमें प्रकट हो सकता है, वैसे ही निराकार परमेश्वर आकार ग्रहणकर साकार हो सकता है । सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी मायाकृत साकारता होनेपर भी उसकी निरा- कारता, सूक्ष्मता, व्यापकता एवं सर्वकारणतामें कोई अन्तर नहीं आता । कहा जाता है, संसारमें जितनी साकार वस्तुएँ हैं, वे सब परमाणुओंके संयोगसे ही बनती हैं; किंतु यह बात केवल आरम्भवादमें ही है, परिणामवादके लिये यह आवश्यक नहीं । परिणामवादमें जैसे दुग्धका ही दधिभाव होता है, मृत्तिकाका घटभाव होता है, वैसे ही प्रकृतिका ही अन्यथाभाव परिणाम होता है । वहाँ तो यही कहा जा सकता है कि सूक्ष्म एवं व्यापक वस्तु ही स्थूल एवं व्याप्य भिन्न-भिन्न पदार्थोंके रूपमें परिणत होती है। विवर्तवादमें सूक्ष्मतम ब्रह्मका ही अतात्त्विक अन्यथाभावरूप विवर्त सम्पूर्ण प्रपञ्च है । किंतु किसी भी पक्षमें ईश्वरके साकार होनेमें कोई आपत्ति नहीं होती । सर्वसम्मतिसे-जीवात्मा व्यापक हो या अणु, पर है निराकार ही । साकार रूप धारण करनेसे वह राकार होता है। यही बात ज्यों-की-त्यों ईश्वरके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । भेद इतना ही है कि जीव इन सब बातोंमें कर्मपरतन्त्र है, ईश्वर स्वतन्त्र है । साकार होनेका यह कदापि अर्थ नहीं कि कूटस्थ ईश्वर विकृत होकर अपनी निराकारता, सूक्ष्मता, व्यापकताको खोकर साकाररूपमें परिणत हो जाता है। इसीलिये भापका पर- माणु बादल बन जाय या बादलका परमाणु जल बन जाय इत्यादि दृष्टान्तोंके लिये यहाँ कोई स्थान नहीं है । संसारमें विभिन्न वस्तुएँ विभिन्न शक्तिवाली होती हैं । चींटी, सिंह, हाथी, विभिन्न प्राणी भिन्न-भिन्न शक्ति रखते हैं। जो सबपर नियन्त्रण रखता है तथा सर्वशक्तिवाला है, वही ईश्वर है । भिन्न कारणोंमें अपने-अपने कार्योंके उत्पादनानुकूल शक्तियाँ होती हैं । ईश्वर सर्वकारण है, अतः उसमें सर्व- कार्योत्पादनानुकूल शक्तियाँ हैं; इसीलिये वह सर्वशक्तिमान् है । बहुत लोग कुतर्क करते हैं कि यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है, तो क्या वह अपने आपको नष्ट कर सकता है ? दूसरा ईश्वर बना सकता है ? वेश्याको कुमारी बना सकता है ? परंतु