भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स और ईश्वर ईश्वरके सम्बन्धमें भारतीय दर्शनोंके आधारपर मार्क्सवादियोंके विचार मार्क्सवादी हिंदू-दर्शन एवं भौतिकवादकी तुलना करते हुए कहते हैं कि 'हिंदू दर्शन ग्रन्थादि किसी एक ही मतके परिपोषक नहीं हैं । भौतिकवादके उल्लेखमात्रसे चार्वाकका नाम याद आता है । लेकिन चार्वाकसे बहुत पहले इसका वर्णन उपनिषदोंमें मिलता है कि सृष्टिका मूल क्या है ? आकाश । सब सृष्ट पदार्थ आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं तथा इसीमे विलीन होते हैं—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ।' ( छान्दो० उप० १ । ९ । १ ) 'जिसको आकाश कहते हैं, वह सब नाम-रूपोंका द्योतक है ।'— आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता । (छान्दोग्य उपनिषद् ८ । १४ । १) इसी उपनिषद्मे ब्रह्मका भी उल्लेख है । इससे स्पष्ट है कि आकाश ब्रह्म नहीं है और यही सृष्टिका भौतिक कारण है । श्वेताश्वतर उपनिषद्की अग्नि वह स्वयम्भू है, जिससे भूतमात्रकी उत्पत्ति है । वह अग्नि भी ब्रह्म नहीं है । एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः । (६ । १५-१६) कहना न होगा कि कई मार्क्सवादियोने भारतीय दर्शनोंका भौतिकवादसे मेल मिलाया है; किंतु अधूरे ज्ञानके कारण वे सदा ही अर्थका अनर्थ ही करते हैं । वस्तुतः उपनिषदोंमें जहाँ सृष्टिका मूल आकाश कहा गया है वहाँ 'आकाश' शब्दका अर्थ है 'ब्रह्म' । 'आ समन्तात् काशते—प्रकाशते इत्याकाशः' प्रकाशमान अखण्ड बोधरूप परब्रह्म ही आकाश शब्दार्थ है । अतएव ब्रह्मसूत्रमे कहा गया है— 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' (वेदान्तद० १ । १ । २२) — आकाश पदार्थ परमात्मा है, क्योकि जगदुत्पत्ति, स्थिति, प्रलय-कारणतारूप लक्षण उस ब्रह्ममें ही घटता है, भूताकाशमे नहीं । क्योकि उन्हीं उपनिषदोंमें आकाशादि भूतोकी उत्पत्ति ब्रह्मसे कही गयी है, 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' ( तै० उ० २ । १ ) उस अपरोक्ष आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति होती है । 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ॰ तद् ब्रह्म ।' ( तै० उ० ३ । १ ) जिस परमात्मासे सब भूत उत्पन्न होते हैं, वह ब्रह्म है । जो आकाश नाम-रूपका निर्वाहक है, वह आकाश भी वही ब्रह्म है । ( देखिये, छा० उ० ८ । १४ । १ शांकरभाष्य ) श्वेताश्वतरका