भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 586, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 586

उपसंहार [पृ. ८२७]

राजनीतिक शास्त्र या दर्शनका कार्य राजाओं, शासकों एव तच्छासित भूखण्ड या अखण्ड भूमण्डल या प्रपञ्चमण्डलके प्राणियोंके लिये ऐहिक आमुष्मिक अभ्युदय एवं परम निःश्रेयस-प्राप्तिका प्रशस्त मार्ग और अनुष्ठान-सुविधा-प्रत्युपस्थापन करना है। तत्प्रबोधक अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्षग्रन्थ-मनु, नारद, शुक्र, वृहस्पति, अग्नि-मत्स्य-विष्णुधर्मादि पुराण, रामायण, महाभारत आदि राजनीतिक शास्त्र या दर्शन हैं। इस शास्त्रके अभिमत प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्था- पत्ति, अनुपलब्धि-ये छः प्रमाण हैं। मूलरूपमें सत्य-अनृत, चेतन अचेतन दो ही तत्त्व हैं। चेतनमें भी ब्रह्म, ईश्वर, जीव—तीन भेद हैं। अचेतनमें प्रकृति महान्, अहङ्कार आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी; श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण—पञ्च ज्ञाने- न्द्रियाँ, वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ—पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, प्राण, अपान, उदान व्यान, समान—पञ्चप्राण, मनोबुद्धिचित्ताहङ्कारात्मक अन्तःकरण—ये २४ भेद हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चतुर्वर्ग-प्राप्ति फल है। आचार्यपरम्परासे पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र तथा षडङ्ग वेदों एवं अन्य आर्षग्रन्थोंके आधारसे कर्त्तव्या- कर्त्तव्य-ज्ञानपूर्वक कर्त्तव्यपालन, अकर्त्तव्य-परिवर्जनसे धर्मकी प्राप्ति होती है । धर्माविरुद्ध अर्थशास्त्रोक्त उद्योगपरायण होनेसे अर्थकी प्राप्ति होती है, धर्मार्थाविरुद्ध कामशास्त्रोक्त मार्गसे शब्दादि साधनसामग्रीद्वारा काम-प्राप्ति होती है। औपनिषद परब्रह्मके तत्त्वविज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। आन्वीक्षिकी, न्यायोपबृंहित वेदान्तविद्या—ब्रह्मविद्या, त्रयी वेदोक्त धर्मविद्या, वार्त्ता, अर्थविद्या आदि सर्वपुरुषार्थोपयोगिनी विद्याओं का रक्षण एकमात्र राजनीतिसे ही सम्भव होता है । उसके बिना सभी विद्याएँ नष्ट हो जाती हैं । राजनीतिकी स्वरूपभूता दण्डनीतिके विप्लुत होनेसे सभी विद्याएँ विप्लुत हो जाती हैं । 'आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता सतीविद्याः प्रचक्षते। सत्योऽपि हि न सत्यस्याद्दण्डनीतेस्तु विभ्रमे।' (काम०नी० २।८) 'मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्।' (महा० शा० ६३।२८) आर्यमर्यादाकी रक्षा, वर्णाश्रम-व्यवस्था तथा त्रयीके प्रोत्साहनसे लोक- प्रसाद होता है अन्यथा लोकावसाद होता है । 'व्यवस्थितार्यमर्यादः कृतवर्णाश्रम- स्थितिः। त्रय्या हि रक्षितो लोकः प्रसीदति न सीदति ॥ (कौटलीय अर्थ० १।३।१७) देहेन्द्रिय मनोबुद्धि आदिसे भिन्न परलोकगामी कर्त्ता भोक्ता, आत्मा तथा परलोकमें विश्वासके अनन्तर ही धर्ममें प्रवृत्ति होती है कर्तृत्व-भोक्तृत्वशून्य, अच्छेद्य, अभेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, ब्रह्मात्मविज्ञानसे परम कैवल्यमोक्ष तथा जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है तथा निःसन्देह एव निर्भय होकर समष्टि विश्वहितसाधनार्थ राजनीतिक सन्धि-विग्रहादिमें सफल प्रवृत्ति हो सकती है। इसीलिये गीतामें 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि' आदिसे नित्य, शुद्ध, बुद्ध, आत्मस्वरूपका वर्णन है और राजर्षियोंको इस ब्रह्मविद्याका वेत्ता-वेदयिता बतलाया गया है । विश्व, विराट्, तैजस, हिरण्यगर्भ, प्राज्ञ, ईश्वर, कूटस्थ, ब्रह्मरूप व्यष्टि समष्टिके अभेद-बोधसे ही आत्महित एव विश्वहितमें एकता होती है । व्यष्टि