भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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उपसंहार ८२९ है । वृद्धोंकी सेवाका भी मूल विज्ञान है; इसलिये विज्ञानसम्पन्न होकर, जितात्मा होकर सर्वसुखार्थ प्रवृत्त होना आवश्यक है । मनुके अनुसार— आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतानि वृत्तौजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः ॥ (मनु० १ । ५-६) सम्पूर्ण जगत् सृष्टिके प्रथम नाम-रूपरहित, कल्पनातीत, अलक्षण, सर्वतःप्रसुप्त, तमोमय अर्थात् अनिर्वचनीय अज्ञान-विशिष्ट चिन्मात्र था । सर्वकारण परब्रह्म परमेश्वर स्वयम्भू भगवान् ही तमको अभिभूत करके इस अव्यक्त जगत्‌को व्यक्त करते हुए प्रादुर्भूत होते हैं । जैसे वसन्त, ग्रीष्म आदि ऋतुओंके बदलनेपर ऋतुलिङ्ग प्रकट होते हैं, उसी तरह प्राणी समयानुसार अपने-अपने कर्मोंको प्राप्त होते हैं । कर्मानुसार ही चराचर विश्वका उत्पादन भगवान् करते हैं—'यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम्' (मनु० १ । ४८) । कर्मानुसार ही विविध योनियोंमें प्राणियोंके जन्म होते हैं । कर्ममूलक सृष्टिका विस्तार वर्णाश्रम- व्यवस्थाका प्रतिपादन करके मनु कहते हैं कि समाजमें अराजकता होनेपर सारी प्रजा घबड़ाकर भयसे इधर-उधर भागने लगी, तब उसकी (प्रजाकी) रक्षाके लिये प्रजापतिने इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र और कुबेर—इन आठ लोकपालोंके अंशसे राजाका निर्माण किया— अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् । रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च । चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ (मनु० ७ । ३-४) देवताओंके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण ही राजा अपने तेजसे सब प्राणियोंको दबा लेता है । राजा बालक हो तो भी मनुष्य समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिये । उस राजाके लिये भगवान्‌ने सब प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले धर्मस्वरूप ब्रह्मतेजोमय दण्डका निर्माण किया । उस दण्डके भयसे ही स्थावर-जङ्गम सभी प्राणी अपने पदार्थोंका उचित उपभोग कर पाते हैं तथा अपने कर्त्तव्यसे विचलित भी नहीं होते— तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । भयाद् भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ (मनु० ७ । १५) दण्ड ही राजा, पुरुष, नेता, शासक और चारों आश्रमोंके धर्मका साक्षी है— स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः। चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ (मनु० ७ । १७)