भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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८३७ उपसंहार राजाको सक्रिय विद्वानोंके साथ बैठकर विनययुक्त होकर आन्वीक्षिकी, त्रयी वार्ता एवं दण्डनीतिका विचार करना चाहिये— आन्वीक्षिकीं त्रयीं वार्तां दण्डनीतिं च पार्थिवः । तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेद् विनयान्वितः ॥ (का० नी० २ । १) वात्स्यायनने भी भूमि, हिरण्य, पशु, धान्य, भाण्डोपस्कर मित्रादिके पहले विद्याके ही उपार्जन एवं वर्धनको अर्थ माना है—विद्याभूमिहिरण्यपशुधान्य- भाण्डोपस्करमित्रादीनामर्जितस्य विवर्धनमर्थः । (वात्स्या० कामसूत्र १।२।१०) मधुकरकी वृत्तिसे राजाका संगृहीत कोष भी अपने उपभोगार्थ न होकर प्रजाहितार्थ ही होना चाहिये। शास्त्रधर्मनियन्त्रित शासन ही रामराज्य है। इसमें प्रजाकी रुचि तथा सम्मतिका पूरा ध्यान रखा जाता है, तथापि शास्त्र एवं धर्मविरुद्ध बहुमतके आधारपर कोई अनर्थ नहीं किया जाता । फिर भी जहाँ अनेक जाति उपजाति तथा सम्प्रदायके लोग बसते हों, वहाँ सबके धर्म, संस्कृतिकी रक्षा होनी चाहिये । किसीके देवस्थान, धर्मग्रन्थ, आचार्य एवं आचार व्यवहारकी अव- हेलना कदापि न होनी चाहिये । सभीके धर्मका निर्णय उन-उन सम्प्रदायोंके धर्मग्रन्थों तथा धर्माचार्योपर ही छोड़ा जाना चाहिये । शासनका उसमें हस्तक्षेप न होना चाहिये। राष्ट्रके परमोपकारक गोवंशका सभी दृष्टिसे पालन होना चाहिये । उसका वध सर्वथा अवरुद्ध होना रामराज्यकी विशेषता है। देशको सर्वथा अखण्ड रखना चाहिये । प्रान्तों या राज्योंको अपने घरेलू मामलोंमे स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये । पर राष्ट्रहितके व्यापक कार्यमें सम्पूर्ण देशकी एक नीति रहनी चाहिये । राजा या राष्ट्रपति किंवा शासनपरिषद्के नीचे आठ विद्वानोंकी एक परिषद् होनी चाहिये । ये विद्वान् वेद, धर्मशास्त्र, राजनीति, समाजनीति, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद आदि विद्याओं तथा विविध भाषाओ एवं देशविदेशकी नीतिके वेत्ता हों । यदि सभी सब विषयोंके ज्ञाता न भी हों तथापि पूरी परिषद् मिलकर उपर्युक्त विषयोंकी पूरी जानकारी अवश्य रखे । परिषद्के सदस्य अपनी सहायताके लिये पृथक्-पृथक् परामर्शसमिति भी रख सकते हैं। प्रजाकी सम्मति, रुचि तथा आन्तरिक स्थिति एवं शासनप्रणालीके सुपरिणाम, दुष्परिणाम जाननेके लिये एक लोकसभा होनी चाहिये । उसके सदस्य प्रजाप्रिय हों । उन्हें प्रजाकी सम्मतिसे उपर्युक्त अमात्य परिषद् ही नियुक्त करेगी । मुण्डगणनाके आधारपर यह कार्य न होना चाहिये । राजा, प्रजा, अमात्यमण्डल सभीमें ईश्वरपरायणता और धर्मनिष्ठा होनेसे शासनव्यवस्था ठीक चल सकेगी। वैसा न होनेसे छल, कपट तथा मिथ्या आचरणका ही बोलबाला रहेगा । धर्मनिष्ठाके बिना कानूनकी वञ्चना ही