मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ८३५ स्थापयध्वमिमं मार्गं प्रयत्नेनापि हे द्विजाः । स्थापिते वैदिके मार्गे सकलं सुस्थिरं भवेत् ॥ (सूतसंहिता, ज्ञानयोगख० २० । ५४) विद्वानोंको वैदिक धर्मकी स्थापनाके लिये सुदृढ प्रयत्न करना चाहिये । वैदिक-धर्मके स्थिर होनेपर सब कुछ स्थिर हो जायगा । यही यह भी कहा गया है कि जो समर्थ होनेपर भी सर्व प्रकारसे धर्मरक्षार्थ प्रयत्नशील नहीं होता, वह पापका भागी होता है । माता-पिताकी, गुरुजनोंकी या जनसमूहके धन धर्म एवं प्राणोंका विनाश हो रहा हो, कोई समर्थ पुरुष बैठे-बैठे तमाशा देखे, कुछ प्रयत्न न करे, यह प्रत्यक्ष ही पाप है— यश्च स्थापयितुं शक्तो नैव कुर्याद् विमोहितः । तस्य हन्ता न पापीयानिति वेदान्तनिर्णयः ॥ (सूतसंहिता, २ । २० । ५५) किंतु जो समर्थ न होनेपर भी यथाशक्ति धर्मशास्त्र मर्यादाकी रक्षाके लिये प्रयत्न करता है, वह उसी पुण्यके प्रभावसे सब पापोंसे मुक्त होकर सम्यक् ज्ञानका भागी होता है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि यम कहे जाते हैं । यह निवृत्तिमार्गानुसारियोंके लिये बड़े ही महत्त्वके हैं । शौच, संतोष, स्वाध्याय आदिमें कुछ गड़बड़ी क्षम्य भी हो सकती है, परंतु यमके सेवनमें तो पूर्ण तत्परता होनी चाहिये । इसीलिये कहा गया है—'यमान् सेवेत सततं नियमान् मत्परः क्वचित्' (श्रीमद्भा०) यमोंका सेवन सर्वदा ही करना चाहिये। नियमोंमें सातत्य न होनेपर भी काम चल सकता है। अहिंसा आदिका अभिप्राय है—मनसा, वाचा, कर्मणा, प्राणिरक्षण करना, प्राणियोंको पीड़ा न पहुँचाना। यही लोकरक्षण, प्राणिरक्षण, धर्मरक्षण राजनीतिका मुख्य लक्ष्य है, यही क्षत-त्राण है। इसी कारण महात्माओंकी इन कार्योंमें प्रवृत्ति होती थी । कालकवृक्षीय-जैसे अरण्यवासी, चाणक्य-जैसे बालब्रह्मचारी, समर्थ स्वामी-जैसे निवृत्तिनिष्ठ लोग भी उस काममें संलग्न हुए । फिर भले ही इस काममें सफलता मिले अथवा न मिले, समुचित प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होता । उसका अदृष्ट फल तो अवश्य ही प्राप्त हो जाता है, तभी तो भगवान् कृष्णने कहा था— यः स्थापयितुमुद्युक्तः श्रद्धयैवाक्षमोऽपि सन् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग् ज्ञानमवाप्नुयात् ॥ धर्मकार्यं यतञ्छक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानवः । प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र मे नास्ति संशयः ॥ (महा० उद्यो० ७३ । ३) इन सब बातोंसे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान दुस्समयपर जब कि जनताके धन धर्मपर संकट उपस्थित है, विशिष्ट विद्वानों, महात्माओं तथा धार्मिक सद्गृहस्थोंको भी राजनीतिसे न डरकर आगे आना चाहिये और धर्म-रक्षणके लिये जो भी आवश्यक कार्य हो करना चाहिये । परिणाम निश्चयेन शुभ ही होगा । शिवमस्तु सर्वजगतः । शम् ॥