भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३१२ मार्क्सवाद और रामराज्य नफा घट जाता है । खेतीसे उत्पन्न चीजोंका दाम बढता है । तब कारीगरीसे पैदा होनेवाली चीजोंका दाम घटता रहता है; क्योंकि नयी मशीनोंके आविष्कार तथा मजदूरोंके उत्तम प्रबन्धसे चीजोंके बननेमें लागत कम बैठती है। इस स्थितिका फल यह होता है कि पूँजीपर नफा घटता है, पूँजी कम होती जाती है, मजदूरी बढ़ती जाती है । पर मजदूरोंको उससे कोई लाभ नहीं; क्योंकि भोजन-सामग्रीका मूल्य बढता जाता है । उस समय नफा जमींदारो, जमीन तथा मकानमालिकोंके हिस्सेमें ही आता है, जो कि समाजकी उन्नतिका लिये कुछ भी नहीं करते ।' माँग और पूर्तिका नैसर्गिक नियम जिस प्रकार व्यक्तिवादी अर्थशास्त्रियोंने उपस्थित किया है, वह सामान्य स्थितिमें उपयुक्त होते हुए भी जब शोषणका कारण बनने लगे तो उसपर राज्यका नियन्त्रण अनिवार्य है । पक्षपातविहीन ईमानदार शासनका यही काम है कि वह उत्पन्न विरोधको दूरकर समन्वय एवं सामञ्जस्य स्थापित करे । दण्ड्यको दण्ड दे, अनुग्राह्यपर अनुग्रह करे, मात्स्य-न्याय मिटाये; यही राज्यका लक्ष्य होना चाहिये । विरोध बढ़ाना, उत्तेजना फैलाना, विनाशके दृश्यकी उत्सुकतासे प्रतीक्षा करना, किसी सरकार या दलके लिये शोभाकी बात नहीं है । विरोध या सघर्ष कोई सिद्धान्त नहीं है । काम, क्रोध, लोभ, मार- काट, छीना-झपटी स्वाभाविकतया ही अधिक होते हैं । निग्रहानुग्रहद्वारा मात्स्य- न्याय दूर करना एक बात है और सबका स्वामी स्वयं बन जाना दूसरी बात । कल-कारखानोंद्वारा उत्पादन बढ़नेसे जो दोष बढ़ते हैं, वे केवल मालिक बदल जानेसे घट न जायेंगे और न गुण ही हो जायेंगे । दूसरा मालिक जिस प्रकार उन दोषोको मिटा सकता है, उसी प्रकार पहला मालिक भी । केवल अपेक्षित है—ईमानदारीसे राष्ट्र-हितकी भावना । इसके बिना मजदूर सरकार भी कभी दोष नहीं मिटा सकती । उसीके सहारे कोई भी सरकार इन दोषोको मिटा सकती है । वस्तुतः यह संघर्ष भी मुट्ठीभर लोगोंका ही है । मिल-मालिक, पूँजीपतियोंकी संख्या नगण्य है । मजदूरोंकी संख्या भी सीमित ही है । भारत-जैसे देशमें मिल-मालिक मजदूरोंसे आठगुणी अधिक संख्या उन लोगोंकी है, जो न मजदूर हैं, न पूँजीपति और न जिनका इन संघर्षोंसे कोई प्रयोजन ही है । वे खेती करनेवाले, साधारणरूपमें व्यापार करनेवाले, पलटन, पुलिस, क्लर्क या अन्य ढंगके पेशेवाले हैं । उन सबके हितों तथा मतोंकी उपेक्षा करके मजदूरतन्त्र शासन स्थापित करनेका प्रयत्न सर्वथा अलोकतान्त्रिक है । जो कहते हैं कि कई उद्योगप्रधान देशोंमें ५० प्रतिशतसे भी अधिक मजदूरोंकी संख्या है, वे मतगणनाके मार्गसे मजदूरोंकी सरकार स्थापित क्यों नहीं कर लेते ? फिर