मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमर्थन किया था । उस समयके स्थापित समाजवादी शासनको अभिमानपूर्ण- तानाशाहीका नाम दिया गया था । उस सम्बन्धमें यद्यपि कई आधुनिक समाज- वादी लीपा-पोती करते हुए कहते हैं कि 'यदि स्वयं मेहनत करनेवाले मजदूरोंका शासन करेगा तो मेहनत करनेवालोंका शोषण हो ही नहीं सकता । जो लोग पैदा नहीं करते, उनका शोषण किया जा सकता है ? हाँ, मजदूर-शासनमें कुछ लोगोंका दमन हो सकता है, उन्हें नागरिक अधिकारोंसे वञ्चित किया जा सकता है।' पर ये लोग कौन हैं, इनकी संख्या कितनी है, इनका भी दमन क्यों होगा ?
'मजदूर-राज्यमें प्रत्येक व्यक्ति मजदूर भी होगा और शासक भी। जब पूँजीवादी देशोंमे भी उनकी सख्या ९२ प्रतिशत या ९९ है । फिर मजदूर-राज्यमें तो उनकी सख्या शत-प्रतिशत होगी। काम न करनेवालोंकी सख्या हजारोंमें एक होगी। ऐसे लोग यदि समाजकी रायसे स्थापित शासनको उखाड़कर स्वार्थानुकूल शासन करना चाहें तो ऐसा करनेकी उन्हें स्वतन्त्रता देना प्रजातन्त्रके कहाँतक अनुकूल होगा? हाँ, मजदूर- शासनमें यदि कुछ व्यक्ति ऐसे हैं, जो सम्पूर्ण जनताके लाभार्थ समाजकी व्यवस्थामें परिवर्तन लाना चाहते हैं तो एक मजदूर होनेके नाते अपने विचार प्रकट करनेकी उन्हें उतनी ही स्वतन्त्रता है जितनी किसी दूसरे मजदूरको; क्योंकि मजदूरतन्त्रमें नागरिकोंके साधन और अधिकार समान होते हैं।'
उपर्युक्त कथन सर्वथा सत्यका अपलापमात्र है । क्या किसानोंकी भूमि-सम्पत्ति गरीब व्यापारियोंके व्यापार-साधनोंको छीन लेना शोषण नहीं है ? भारतके काश्त- कार आज भी अपनी काश्तकारी बचानेका आन्दोलन कर रहे हैं। यत्र-तत्र भू-स्वामी-सङ्घ, काश्तकार-सङ्घ बन रहे हैं। वे भूमि एव सम्पत्तिके अपहरणको घृणा- की दृष्टिसे देखते हैं और समष्टि या समाजके नामपर मुट्ठीभर तानाशाहोंके हाथमें अपनी भूमि-सम्पत्ति देकर, शासनयन्त्रका नगण्य कल-पुर्जा नहीं बनना चाहते । वस्तुतः मजदूरोंपर भी बलात्कारसे जडवादी तानाशाही शासन लादा ही जाता है। प्रायः गरीब मजदूर ईश्वरवादी धार्मिक होते हैं । भारतके शत-प्रतिशत मजदूर आस्तिक और धार्मिक हैं। वे रामायण, भागवत, गीताका सम्मान करते हैं, सत्यनारायणकी कथा सुनते, कीर्तन करते हैं केवल बोनस, वेतन, भत्ताका प्रलोभन देकर कम्युनिष्ट उन्हें अपने आन्दोलनोंमें शामिल करते हैं। यदि वे समझ जायें कि कम्युनिष्ट ईश्वर, धर्म एव शास्त्र नहीं मानते तो वे भूलकर भी उनके डाँड़े न जायें । हाँ, उनकी अपेक्षित माँगमें कोई ईश्वरवादी-दल सहायक हो तो वे सोलह आने उसीका साथ देंगे। हरेक मजदूर भी स्वतन्त्रता चाहता है।