भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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रोटी या नीमकी पत्तीका जो महत्त्व है, वह हीरेका नहीं । जो वस्तु जिसके बाह्य या आन्तरिक आवश्यकताओ, इच्छाओंकी पूरक होती है, उसके प्रति ही उसकी कीमत होती है । कभी-कभी एक गिलास पानी या एक टुकडा रोटी भी सैकड़ों हीरेके बराबर ठहरती है । गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—'सपति सगरे जगतकी, स्वासा सम नहिं होइ ।' सारे संसारकी सम्पत्ति एक श्वासके बराबर नहीं होती । यदि कोई गुणी करोड़ों हीरा लेकर भी मरणकालमें श्वास लौटा दे, तो यह सौदा महँगा नहीं समझा जाता । वस्तुतः मार्क्स श्रमको ही आमदनी या मूल्यका आधार मानकर, प्राकृतिक वस्तु या कच्चे मालके उत्पादनका महत्त्व घटाकर मजदूर-राज्यका औचित्य सिद्ध करना चाहता है, परंतु उपर्युक्त कथनानुसार यही कहा जा सकता है कि मूल्यमें श्रम भी कारण है । जैसे श्रम बिना कभी मशीन एवं कच्चे माल तथा भूमि- खान आदि अन्य प्राकृतिक साधन मुर्दे पड़े रहते हैं, वैसे ही श्रम भी उपयुक्त साधनों बिना निरर्थक ही रह जाता है । काम लेनेवाला न हो तो कामका कुछ भी फल नहीं होता । काम लेनेवाला तथा दाम देनेवाला न मिलनेसे ही बेकारीका प्रश्न उठता है । यह ऊपर कहा ही जा चुका है कि अनेकों ऐसी वस्तुएँ हैं, जिनके उत्पादनमें श्रम कुछ नहीं हुआ और उनका उपयोग-मूल्य एवं विनिमय-मूल्य दोनो ही होता है । कोई भी कार्य लाभके लिये ही किया जाता है, तभी अति समान वस्तुका विनिमय नही होता । अर्थात् एक मन गेहूँका उसी ढगके एक मन गेहूँके साथ विनिमय नहीं किया जाता । यातायातके द्वारा देशान्तर, कालान्तरके सम्बन्धसे क्रय-विक्रय या विनिमय लाभके लिये ही होते हैं । जैसे भारतका जूट विदेशोमें विशेष मूल्य देता है; मार्गशीर्षका चावल श्रावणमें अधिक मूल्यवान् हो जाता है । अपनी आवश्यकतासे अधिक उत्पादन होने एवं अन्य वस्तुओंकी अपेक्षा होनेसे ही विनिमय या क्रय-विक्रयकी बात चलती है । अतएव खेती, मजदूरी और नौकरीके धंधेके समान ही क्रय-विक्रयका एक धंधा है । यदि उससे लाभकी सम्भावना न हो तो उसमें कोई प्रवृत्त ही क्यो हो ? मूल्य और श्रम कहा जाता है, 'मशीनोके नये आविष्कारो एवं उत्पादनके कामोमें दक्षता आनेसे कम श्रममें वस्तु उत्पन्न होने लगती है । इसीलिये वस्तुका दाम कम हो जाता है । अतः सिद्ध है कि श्रम ही विनिमय-मूल्यका आधार है ।' पर यह बात ठीक नहीं जँचती । कारण, दूसरा पक्ष यह कह सकता है कि मालकी अधिकताके कारण ही माँग घटी और माँग घटनेसे विनिमय-मूल्य घटा । माल बढानेके कारण मशीनें भी हैं ही । आवश्यकतासे अधिक सौदा तैयार हो जानेपर मार्क्सवादी श्रमको मा० रा० २१--