भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 660

मार्क्सकीय अर्थ-व्यवस्था ३२७ घंटेतक परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम होगा और उसे जो बाजारमें मिला वह एक हजार घंटे परिश्रमका दाम है। 'यदि पूँजीपति मजदूरको पाँच दिनतक दस घंटे परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम ढाई दिनके परिश्रमके बराबर देता है तो उसे प्रति मजदूर ढाई दिनका परिश्रम मुनाफेमें बच जाता है। उसका कुल मुनाफा चार दिनके परिश्रमका परिणाम हो जाता है। अर्थात पूँजीपतिने अपने बीस मजदूरोंको उतना रूपया दिया जिससे वे पाँच दिन जीवित रहें और मजदूरोंने मालिकको उतना रूपया दिया जितना कि बीस आदमियोंकी पाँच दिनकी मेहनतसे पैदा होता है। "जैसे घोड़ेके दिनभर परिश्रम करनेके योग्य बनाये रखनेके लिये घास-दाना- में जो खर्च होता है, वह उसकी परिश्रमशक्तिका दाम है। घोड़ेकी दिनभरके परिश्रमसे जो कमायी होती है, वह उसके परिश्रमका दाम होता है। दोनोंमें जो अन्तर है, वही मुनाफा है। परिश्रमशक्तिको बनाये रखनेमें जो खर्च होगा, वह परिश्रम के दामसे कहीं कम होता है। इसी तरह मजदूरकी परिश्रमशक्तिका पूरा दाम मिलनेपर भी परिश्रमके दामसे वह बहुत कम होता है। परन्तु मजदूरोंकी संख्या बाजारमें अधिक होती है। आधा पेट खाकर परिश्रमशक्तिका दाम भी उचित (मुनासिब) से कम लेकर मजदूरी करते हैं। गांठकी पैदावारसे मजदूरको जितना ही कम मिलता है, उतना ही मालिकका मुनाफा बढ़ता है।" देशकालके भेदसे भावोंमें भेद हो जाता है। जिस देशमें जिस वस्तुकी अधिक आवश्यकता या माँग होती है, अन्यत्र कम दाममें खरीदी वस्तु वहाँ अधिक दाममें बिकती है। दिखाया जा चुका है कि किसी देशकालमें पानी भी कीमती हो जाता है, इसीलिये कालान्तग्में खरीदी वस्तु कालान्तरमें और देशान्तरमें खरीदी वस्तु देशान्तरमें बेचनेकी लाभके ही लिये पद्धति चलती है। बुद्धिकी विशेषतासे भी लाभमें विशेषता होती है। कथासरित्सागरकी कथा है कि एक व्यक्तिने एक मृतमूषिकाको, जो सामान्य दृष्टिसे व्यर्थ ही कही जाती है, लेकर व्यापार करनेका निश्चय किया। किसीने एक आना पैसा देकर उसे अपनी बीमार बिल्लीके लिये खरीद लिया। वह उसी पैसेसे भुना चना खरीदकर शीतल जल लेकर मार्गके किसी वृक्षकी ठंढी छायामें बैठ गया। लकड़ीका बोझ लेकर आते हुए भूख-प्यासे लकड़हारोंने वहीं रुककर और चना खाकर जलपान किया तथा बदलेमें वे उसे थोड़ी-थोड़ी लकड़ियाँ देते गये। उन लकड़ियोंके बेचनेसे उसे पाँच रुपये प्राप्त हो गये। उसमें उसने कुछ तो अपने भोजनमें व्यय किया और शेषका पुनः चना खरीद लिया। इसी प्रकार उनसे उसे पुनः लकड़ियाँ मिलीं और शनैः-शनैः वह महाधनवान् हो गया। फिर जिसके पास पूँजी हो उसमे तो वह बहुत कमा सकता है।