मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३५५ पूँजीपति ही है, अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना सर्वथा निराधार है। धर्मशास्त्रोने स्पष्ट ही आयमें पूँजी लगानेवालोका हिस्सा बतलाया है। वेतनके सम्बन्धमें आपसी समझौते तथा न्यायालयके मतका उल्लेख वृहस्पति-स्मृतिमें इस प्रकार है— कुलीनदक्षानलसैः प्राज्ञैर्नाणकवेदिभिः । आयव्ययज्ञैः शुचिभिः शूरैः कुर्यात्सह क्रियाः ॥ समोऽतिरिक्तो हीनो वा यत्रांशो यस्य यादृशः । क्षयव्ययौ तथा वृद्धिस्तस्य तत्र तथाविधा ॥ प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना । समन्यूनाधिकैरंशैर्लाभस्तेषां तथाविधः ॥ (बृहस्प० स्मृति० गायक० १३ । १-२, ४) अर्थात् कुलीन, दक्ष, निरालस्य, विद्वान्, व्यापारविशेषज्ञ, आय-व्ययके ज्ञाता साहसी लोग मिलकर व्यापार करे। मूलधनमें जिनका जितना कम या अधिक अंश होता है, उसके अनुसार हीं उनका हानि-लाभमें भी भाग रहता है। सुवर्ण, अन्न, रसादिका व्यापार करनेवालोका मूलधनके भागके अनुसार ही लाभमें भी भाग होता है। यहाँ स्पष्ट ही व्यापारमें धन लगानेवालोका ही लाभमें हिस्सा कहा गया है। लाभको श्रममात्रका फल नही माना गया। समो न्यूनाधिको वांशो येन क्षिप्तस्तथैव सः । व्ययं दद्यात्कर्म कुर्याल्लाभं गृहीत चैव हि ॥ क्षयहानिर्यदा तत्र दैवराजकृताद् भवेत् । सर्वेषामेव सा प्रोक्ता कल्पनीया तथांशतः ॥ (बृहस्प० स्मृति० गायकवाड संस्कृ० १३ । ५, ८) बराबर या कम-अधिक मूल धनमें जिसका जैसा भाग होता है तदनुसार ही उसका वेतन आदि सम्बन्धसे व्यापारिक व्ययमें खर्च होगा, तदनुसार ही लाभमें हिस्सा मिलेगा। उसी तरह यदि राजकृत या दैवकृत हानि हो तो भी मूलधनके भागानुसार ही हानि भी सबको ही सहनी पड़ेगी। अनिर्दिष्टो वार्यमाणः प्रमादाद्यस्तु नाशयेत् । तेनैव तद्भवेद्देयं सर्वेषां समवायिनाम् ॥ राज्ञे दत्त्वा तु षड्भागं लभेरंस्ते यथांशत ॥ दैवराजभयाद्यस्तु स्वशक्त्या परिपालयेत् । तस्यांशं दशमं दत्त्वा गृह्णीयुत्तँऽशतः परम् ॥ (बृह० स्मृ० १३ । ९-११)