मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ मार्क्सवाद और रामराज्य रामराज्यको ही अन्तिम व्यवस्था मान सकता है। मार्क्सके गुरु हीगेलका आदर्श राज्य भी ऐसा ही है, जिसमें अन्तर्विरोध नही होता । चीनी गणतन्त्रमे भी पूँजीवादका विनाश आवश्यक नही समझा गया । रामराज्य-प्रणालीसे बेकारी, भूखमरी नहीं व्यापेंगी । आर्थिक सकट भी नही आयेगा । इसीलिये मालके खपतकी भी कमी नहीं होगी। जैसे पूँजीपति सरकार नये-नये कामोके लिये नयी- नयी मशीनोका आविष्कार तथा प्रयोग कर सकती है, उसी तरह पूँजीपति व्यक्ति भी । जब एक वस्तुका उत्पादन माँगसे अधिक होने लगेगा तो दूसरी वस्तुके उत्पादनमे लग जायगा। जब दूसरे बाजार हैं नही, मालका उत्पादन आवश्यकतासे अधिक होता है, तब काम ठप्प रखनेकी अपेक्षा दूसरे कामका आरम्भ लाभदायक भी होगा । समय-समयपर व्यापारो एव उद्योगोमे उद्योगपति रद्दोबदल करते ही हैं, यह कोई नयी बात नहीं है । सर्वहारा और क्रान्ति मार्क्सवादियोके अनुसार 'साधनहीन श्रेणी अपनी परिस्थितियोके कारण मुख्यतः तीन भागोमे बँटी हुई है, जिनमें किसान, मजदूर और निम्न, मध्यम श्रेणीके नौकरी पेशाके लोग हैं। साधनहीन श्रेणीके इन तीनो भागोमेसे औद्योगिक देशोमें मजदूर लोग संख्यामें सबसे अधिक हैं। संख्यामे सबसे अधिक होनेके अलावा उनका घरबार आदि कुछ भी शेष न रहनेसे समाजकी मौजूदा व्यवस्थासे उन्हे कुछ मोह नहीं। इनकी अवस्थामे परिवर्तन आनेसे इन्हे किसी प्रकारकी हानिका डर नही। औद्योगिक केन्द्रोंमें मजदूरोके बहुत बडी संख्यामे एकत्र हो जानेसे उनमें संगठितरूपसे एक साथ काम करनेका भाव भी पैदा हो जाता है और नगरोमे रहनेके कारण राजनैतिक परिस्थितियोको भी वे बहुत शीघ्र अनुभव करने लगते हैं। पूँजीवादके विरुद्ध आनेवाली साधनहीन श्रेणीकी क्रान्तिमे ये मजदूर लोग ही अगुआ होंगे। किसान भी यद्यपि मजदूरकी तरह ही साधनहीन हैं, परंतु उनकी परिस्थिति उनके सच्चे और सगठित होनेके मार्गमे रुकावट डालती है। किसान प्रायः भूमिके एक छोटेसे टुकड़ेसे बँधा रहता है, जिसपर मेहनत करके वह जो पैदा करता है उसका केवल वही भाग उसके पास रह जाता है, जिसके बिना किसानमे परिश्रमकी शक्ति कायम नहीं रह सकती । शेष चला जाता है भूमिको मालिक कहलानेवाली श्रेणीके लिये । किसानका शत्रु भी मजदूरकी भाँति होता है। और वह भी वास्तवमे मजदूर ही है, जो मिलोमे काम न कर भूमिके टुकड़ेपर मेहनत करता है और अपने आपको साधनहीन न समझकर एक प्रकारसे भूमिके छोटेसे टुकड़ेका मालिक समझता है । भूमिके इस टुकड़ेके मोहके कारण उसे क्रान्तिसे भय लगता है । किसानोका काम करनेका तरीका ऐसा है कि अलग-अलग काम करनेसे उनमें संगठनका भाव भी जल्दी पैदा नहीं हो पाता । नगरोंसे दूर रहनेके कारण वे