भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 695, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 695

३८२ मार्क्सवाद और रामराज्य और भी घट जाती है, इस प्रकार यह चक्कर समाजमें पैदावार और खर्चके दायरेको कम करता हुआ समाजकी एक बड़ी संख्याको भूखे और नंगे रहकर मरनेके लिये छोड़ देता है। "कहा जाता है कि पूँजीवादमें उत्पादन-शक्तियोमे निरन्तर प्रगति होती रहती है। नये-नये साधनोका आविष्कार एवं प्रयोग होता रहता है, परंतु सामाजिक सम्बन्धोमे परिवर्तन नही होता । अर्थात् पूँजीपति और श्रमिकका सम्बन्ध ज्यो-का-त्यो रह जाता है । पूँजीपति श्रमिकोको कम-से-कम वेतन देना चाहते हैं। फलतः प्रति दसवे वर्ष आर्थिक संकट उपस्थित होता है । उत्पादन-शक्तियोके बढ़नेसे लाखों मजदूरोके बदले सैकड़ो मजदूरोसे ही उत्पादन हजारो गुना ज्यादा बढ़ता जाता है । वस्तुओकी बहुतायतके साथ मजदूरोकी बेकारी बढ़ती जाती है और उनकी क्रयशक्ति घटती जाती है। अतः बाजारमे वस्तुओकी खपत कम हो जाती है। यह क्रम उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। इस तरह पूँजीपतिके भी सामने प्रश्न खडा होता है कि वह अपना माल कहाँ बेचे ? इसका पहला मार्ग खोजा गया साम्राज्यवाद । निर्भीक होकर पूँजीपति दुनियाके कोने-कोनेमे पहुँचे । विश्वविजयका मार्ग अपनाया । औपनिवेशिक युद्ध किये । भारत, अमेरिका, कनाडा मे बाजार बनाया । वहाँसे सस्ता कच्चा माल प्राप्त किया । किसी देशके निवासियोको पराजित किया । किसी देशके निवासियोको मिटा भी दिया । यूरोपके पूँजीपतियोने दुनियाको अपना बाजार बना लिया । कहा जाता है—'लार्ड डलहौजीके समय भारतमे जो सुधार हुए, मार्क्सकी दृष्टिसे वे सुधार हुए ही नहीं, किंतु उस समय औद्योगिक क्रान्तिके कारण इंग्लैडमें रेल, तार आदिके सामान पर्याप्त बन गये थे । इस मालकी खपतके लिये पहले यूरोप और अमेरिकाके बाजार थे, किंतु कुछ समयके बाद और नये बाजारोंकी आवश्यकता हुई । तब भारतके द्वारा इस समस्याकी पूर्ति की गयी । भारतमे रेल-तारका सामान महँगे-से-महँगे दामोपर बेचा गया । फिर रेलोद्वारा भारतवर्षका कच्चा माल इंग्लैडमे भेजनेके लिये सुगमतासे एकत्रित किया जा सकता था । इंग्लैडका माल भी भारतके कोने-कोनेमे पहुँच गया औद्योगिक क्रान्ति सर्वप्रथम ( १७५०-१८५० ) इंग्लैडमे हुई । अतः उसने सर्वश्रेष्ठ साम्राज्य स्थापित कर लिया । बादमे फ्रांस और जर्मनीमें औद्योगिक उन्नति हुई । अतः वे साम्राज्य-निर्माणमें पिछड गये ।' पूर्वोक्त रामराज्य-प्रणालीके अनुसार कहा गया है कि मजदूरोकी संख्या- वृद्धि, वेतनमें वृद्धि, कामके घटोमें कमी होनेसे न तो बेकारी बढ़ेगी और न तो क्रयशक्ति ही घटेगी । फलतः मालकी खपतमे भी कमी न होगी । अतः आर्थिक