मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रमिकोंका वैधानिक सङ्घर्ष स्थिति सुधारनेके लिये पर्याप्त नहीं होता । इजारेदार बैंकशाह वैधानिक सङ्घर्षसे प्रभावित होकर श्रमिकोंकी दशा सुधारनेके लिये प्रस्तुत नहीं हो सकते । ( यहाँ वैधानिक विरोधका तात्पर्य है—मजदूर-सभाओ, सहयोगसमितियो एवं संसदीय दलोंके आन्दोलनसे ) अतः मजदूरोंको क्रान्तिका मार्ग अपनाना पडता है । क्रान्तिद्वारा पूँजीवादका अन्त करनेसे ही श्रमिकोंकी दशा सुधर सकती है । “दूसरा विरोध बैंकशाहोंके विभिन्न गुटों तथा साम्राज्यवादी शक्तियोंके बीच होता है । यह विरोध विभिन्न देशोंके पूँजीवादके असमान विकासके कारण होता है । यूरोपमे सर्वप्रथम इंगलैंडमे औद्योगिक क्रान्ति हुई । फ्रांसने इस क्षेत्रमे उसीका अनुसरण किया । १९ वीं सदीमे कच्चे मालके स्रोत एव तैयार मालके खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता पड़ी । तब उन्होंने दुनियामे साम्राज्य स्थापित किया । तबतक जर्मनी भी औद्योगिक क्षेत्रमें अग्रसर हुआ । उसे भी साम्राज्यकी अपेक्षा हुई, किंतु साम्राज्य-स्थापनाके क्षेत्रमे इंग्लैंडका एकाधिकार था । फलतः साम्राज्य-स्थापनामे पिछडा हुआ मध्य यूरोप पुराने साम्राज्यवादी फ्रांस एवं इंग्लैंडको युद्धद्वारा पराजित करके ही साम्राज्यमें हिस्सा बँटा सकता था । इसीलिये जर्मनी, इटली तथा जापानने युद्धके लिये तैयारियाँ कीं और साम्राज्यवादी लोगोंमें भी अस्थायीरूपसे दो शिविर हो गये । युद्धों, महायुद्धोंद्वारा किसीका विनाश होता है, किसीका आधिपत्य होता है । फिर भी साम्राज्यवादी सङ्घर्षका अन्त नहीं होता, किंतु आन्तरिक विरोध हावी रहता है । तीसरा विरोध सभ्य कहे जानेवाले साम्राज्यवादी राष्ट्रों और पराधीन राष्ट्रोंके बीच होता है । साम्राज्यवादी निर्बल राष्ट्रोंका शोषण करते रहते हैं । साम्राज्यवादी शोषणको सङ्घटित करनेके लिये पराधीन देशोमे रेल-तार आदिके कारखाने खोलते हैं । जनता इनसे मुक्त होनेकी इच्छासे इनके विरुद्ध मोर्चा स्थापित करती है । समयकी प्रगतिसे शोषण बढता है । राष्ट्रीय सङ्घर्ष भीषण बन जाता है । साम्राज्यवादी देशोंके भी शोषित श्रमिकोंकी सहानुभूति पराधीन देशोंके शोषितोंके साथ होती है । बन्धु-भावसे प्रेरित होकर दोनो साम्राज्य- वादियोंके विरुद्ध बगावत करते हैं ।” यह हम कई बार कह चुके हैं कि घटनाएँ ससारमें भली भी होती हैं और बुरी भी । अच्छी घटनाओंका अनुसरण उचित है, बुरी घटनाओंका नहीं । व्यवहारके लिये विधानका ही उपयोग किया जाता है, इतिहासका नहीं । जगद्गुरु भारतकी दृष्टिसे सम्राट् एव सार्वभौमका अभिप्राय देशके केन्द्रीय शासन एवं विश्व-सरकारसे होता था । छोटी-छोटी शक्तियाँ परस्पर टकराकर अपने और संसारके अकल्याणका कारण बनती हैं । इसलिये एक परम समर्थ