मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 740, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंविकासका चक्र चलता रहता है । अतः कृतयुगमें धर्म-राज्य एवं दण्ड आदिसे विहीन धर्मनियन्त्रित राज्य था और वह स्वर्णयुग था—यह आर्ष इतिहासोंसे विदित है । पुनश्च रजोगुण-तमोगुणके विस्तारसे उसमें गड़बड़ी हुई । फिर धर्म- नियन्त्रित राज-तन्त्र हुआ, तमोगुण बढनेसे फिर और विविध विवादमय राज्य हुए । पुनश्च 'चक्रनेमिक्रमेण' धर्मनियन्त्रित लोकतन्त्र, धर्मनियन्त्रित राजतन्त्र एवं पुनः शुद्ध राजादि विहीन धर्मनियन्त्रित राज्य हो सकता है । जैसे प्रतिवर्ष वसन्त, ग्रीष्म आदि ऋतुओंका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही यह भी सम्भव है। मार्क्सका 'वर्ग-संघर्ष' कोई वास्तविक तथ्य नहीं है । यह तो एक विकार है । मात्स्य- न्यायका फैलना धर्म-नियन्त्रण घटनेपर ही बढ़ता है । धर्म-नियन्त्रण बढ़नेपर घट जाता है । यो तो प्रत्येकव्यक्तिके भीतर देवासुर-संग्राम चलता ही रहता है। रजोगुण, तमोगुणके अनुकूल वृत्तियाँ, चेष्टाएँ, भावनाएँ तथा उनसे युक्त व्यक्ति, समुदाय, आसुर समुदाय है । सत्त्वगुणके अनुकूल वृत्तियाँ, भावनाएँ, चेष्टाएँ तथा उनसे युक्त व्यक्ति, समुदाय दैवी समुदाय है । इनका संघर्ष सदा ही चलता है, परंतु कभी व्यक्त कभी अव्यक्त । भीतरका ही संघर्ष कभी-कभी बाह्यरूप धारण कर लेता है । कभी कोई पक्ष जीत जाता है तो कभी कोई पक्ष । तमोगुणपर सत्त्वगुणकी विजय ही अनृतपर सत्यकी, दानवतापर मानवताकी, आसुर-शक्तिपर दैवीशक्तिकी विजय है । यही जडवादीपर अध्यात्मवादीकी विजय है । यही व्यष्टिवादपर समष्टि- वादकी, संकीर्णतापर उदारताकी जीत है । आदर्शवादी दार्शनिक हाब्स आदिके प्राकृतिक मनुष्य और अनुबन्धद्वारा राज्य-कल्पनाको अप्रामाणिकएव अनैतिहासिक कहते हैं । ठीक इसी तरह अति प्राचीन साम्यवादी समाज और वर्ग-भेद आदिकी मार्क्सय कल्पना भी अप्रामाणिक एवं अनैतिहासिक ही है ।
भौतिकवादी व्याख्या
कहा जाता है कि हीगेलके ऐतिहासिक आदर्शवादके मुकाबलेमें ही मार्क्सने अपनी प्रणालीका नाम 'ऐतिहासिक भौतिकवाद' रखा था । इस प्रणालीद्वारा मार्क्स विभिन्न परिवर्तनों, क्रान्तियो एव मानसिक, सामाजिक घटनाओंको उत्पन्न करनेवाले मूलस्रोतोंका पता लगाना चाहता था, इसलिये इतिहास सञ्चालन करनेवाले नियमोंका उसने पता लगाया । उसका कहना था—'मनुष्योंके विवेक एव विचारोंमें परिवर्तन करने- वाली तथा विभिन्न सामाजिक प्रणालियों और पारस्परिक विरोधकी सृष्टि करनेवाली प्रधानशक्ति, विचारो, भावनाओं या विश्वव्यापी ज्ञानसे अथवा सर्वव्यापी आत्माके ज्ञानसे नहीं हुआ, किंतु वह जीवनकी भौतिक अवस्था एवं नियमोंद्वारा ही हुआ है । इसलिये मनुष्यजातिके इतिहासका आधार भौतिक है, अर्थात् जिस मार्गमे मनुष्य एक सामाजिक प्राणीकी हैसियतसे, प्राकृतिक परिस्थितियो, आन्तरिक, शारीरिक और मानसिक शक्तियोंकी सहायतासे अपने सासारिक या भौतिक जीवनका निर्माण