मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरते हुए बतलाया है कि सामान्यरूपसे इन्द्रियोंका अपने विषयोंमें स्वाभाविक राग-द्वेष होता है । अनुकूल विषयमें राग और प्रतिकूल विषयमें द्वेष होता है । उन राग-द्वेषोंके वश न होना ही पुरुषार्थका सार है अर्थात् राग-द्वेषरूप सहकारी कारणसे युक्त होकर ही प्रकृति प्राणीको स्वानुरूप कार्यमें प्रवृत्त करती है— इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ (गीता ३।३४) काम तथा प्रकृति काम्य—रागवान्को ही काम्यकर्ममें प्रवृत्त कर सकते हैं । काम, प्रकृति भी रागहीन द्वेषास्पद पदार्थमें प्राणीको प्रवृत्त नहीं कर सकते । सिंहकी हिंसा-प्रकृति द्वेषास्पद प्राणियोंकी हिंसामें ही उसे प्रवृत्त करती है, द्वेषानास्पद अपने शिशुकी हिंसामें सिंहकी हिंसा-प्रकृति भी उसे नहीं प्रवृत्त कर सकती । अतः जैसे मृत्तिकासे घट बननेमें जल सहकारी कारण है, जल न रहनेपर मृत्तिकासे घट नहीं बनता, वैसे ही प्रकृतिके प्रवर्त्तनमें राग- द्वेष सहकारी कारण हैं । राग-द्वेषके विघटित कर देनेपर प्रकृति या परिस्थिति व्यर्थ हो जाती है । अतः सच्छास्त्रोंके अभ्यास एवं सत्पुरुषोंके समागमसे आवश्यक, उचित, शास्त्रीय राग-द्वेष बनाकर स्वाभाविक पाशविक राग-द्वेषको विघटित कर देना चाहिये । इससे प्रकृति या परिस्थिति व्यर्थ हो जाती है। यही प्राणीका पुरुषार्थ है । इसीमें प्राक्तन सुकृत एवं ईश्वरानुग्रहका भी उपयोग होता है । इस पुरुषार्थके ही बलपर समाज एवं उसकी परिस्थितियाँ, उत्पादन- शक्तियाँ तथा उत्पादन-सम्बन्ध बनाये-बिगाड़े जाते हैं । अनुचित परिस्थितियोंके विघटन एवं उचित परिस्थितिके सम्पादनमें चेतन प्राणीकी ही स्वाधीनता होती है। व्यवहारमें स्पष्ट ही देखा जाता है कि चेतन अचेतनका गुलाम नहीं है; किंतु अचेतन ही चेतनका गुलाम है । दृष्टानुसारिणी ही कल्पना उचित होती है । इसके अनुसार पुरुषार्थपरायण महापुरुष इतिहासको, परिस्थितियोंको बदलते हैं, वे परिस्थितियोंके दास नहीं होते । किसी भी युगमें दुर्गुण, दुर्व्यवस्था, कुविचार एवं आलस्य प्रमादके परिणाम होते हैं, वे सदा ही त्याज्य माने जाते हैं। सद्विचार एवं तत्परतामूलक किसी भी युगकी अच्छाइयाँ सदा ग्राह्य होती हैं। खलोंके लिये विद्या, धन और शक्ति सदा ही विवादार्थ, मदार्थ, तथा परपीडनार्थ थी, सत्पुरुषोंके लिये उक्त तीनों ही वस्तुएँ सदा ही ज्ञानार्थ, दानार्थ एवं रक्षणार्थ थीं । भूत-संघातमय मनुष्य तथा मनुष्य संघातप्राय समाज सभीकी सत्ता अनन्त, अखण्ड व्यापक बोधसे ही निर्धारित होती है । जड़ स्वयं अपनेको ही सिद्ध नहीं कर सकता, तो फिर उसके द्वारा चेतनकी सिद्धि कैसे कही जा सकती है ? प्रकाशके द्वारा घटादिका निश्चय तो होता है, परंतु घटादिके बलपर प्रकाशका निश्चय कोई बुद्धिमान् व्यक्ति माननेको तैयार नहीं होगा।