मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 756, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐतिहासिक भौतिकवाद ४४३
ब्रह्मास्त्रादिके निर्माताओंके धर्म, सिद्धान्तों, विचारों, आचारोंमें कोई भी रद्दो- बदल नहीं हुआ । ब्रह्मलोककी दिव्य ब्रह्मपुरीमें, इन्द्रलोककी दिव्य अमरावतीपुरीमें और विष्णुकी दिव्य वैकुण्ठपुरीमे जो विचार, जो सिद्धान्त, जो आचार आदरणीय थे, वे ही परम अकिञ्चन, वल्कलवसनधारी, कन्दमूल-फलाशी, अरण्यवासी, वीतराग महर्षियोंके यहाँ भी माननीय थे । सप्तदीपा मेदिनीके सम्राट् और अकिंचन दरिद्र ब्राह्मणके आचार, विचार, सिद्धान्त, धर्म एक-से ही होते थे । इन्द्रादि देवगणोंके दिव्य विमान, दिव्य भोग तथा दिव्य शक्तिसे सम्पन्न होनेपर भी उनके सिद्धान्तो एव विचारोंमें कोई भेद नहीं होता था । पीछे बतलाया जा चुका है कि प्राचीन कालमें महायन्त्रोका प्रचलन हुआ था, परतु उसके बेकारी आदि दुष्परिणामोंको देखकर ही आस्तिकोंद्वारा उसपर प्रतिबन्ध लगाया गया था। कुछ धनिकोंको शोषक देखकर 'धनवान् होना ही शोषक होनेका कारण है' यह समझना नितान्त भ्रम है। कुछ बलवानोंको अन्यायी, अत्याचारी देखकर 'बलवान् होना अन्यायी होनेमें हेतु है' यह समझना और कुछ विद्वानोंको दुराचारी देखकर 'विद्वान् होना दुराचारी होनेका कारण है' यह समझना निरा भ्रम ही है। यह बतलाया जा चुका है कि सत्पुरुषोके यहाँ धन, बल एव विद्या सर्वथा दान, रक्षण एव ज्ञान-प्रकाशके लिये होती है । जैसे किसी मक्खीको घी हजम न होते देखकर कोई यह कल्पना करे कि घी किसीको हजम नहीं होता, तो यह भ्रम ही है। पानीसे आग बुझती हुई देखकर यदि कोई पानी-जैसी ही वस्तु पेट्रोलसे अग्नि बुझाना चाहेगा तो यह उसकी मूर्खता ही समझी जायगी । इसी तरह किसी राजा या धनवान्को नास्तिक, प्रमादी एव दुराचारी देखकर यदि कोई वैसी व्याप्ति (नियम) बनाना चाहे तो यह उसका भ्रम ही कहा जायगा । चकमक पत्थरसे अग्नि निकाल लेना, अरणिमन्थनसे अग्नि निकाल लेना, दीपशलाका (दियासलाई) से अग्नि निकाल लेना या और भी किसी आधुनिक साधनसे अग्नि निकाल लेना, इनसे अग्निके दाहकत्व, प्रकाशकत्व सिद्धान्तमें कोई अन्तर नही पडता । हाथकी चक्कीसे आटा पीस लेने या यन्त्रकी चक्कीसे आटा पीस लेनेसे भोजन करके भूख मिटानेके सिद्धान्तमें कोई फरक नहीं पडा है, बल्कि आज भी स्वास्थ्यके विचारसे हाथकी चक्कीका आटा श्रेष्ठ समझा जाता है। आज भी अग्निहोत्रके लिये अरणि-मन्थनसे ही अग्नि प्रकट की जाती है । शमशानकी अग्निसे भी चावल पक सकता है और अग्नि- होत्रकी अग्निसे भी भोजन बन सकता है । फिर भी सस्कारकी दृष्टिसे शमशान- की अग्नि अशुद्ध होती है, उससे पकाये गये अन्नको आस्तिक व्यक्ति ग्रहण नही करते । प्राचीन कालमे अनन्त धन-धान्यसम्पन्न विपुल वैभवयुक्त सार्वभौम सम्राट् सामन्त, साधारण व्यापारी एवं किसान तथा उञ्छशिल वृत्तिवाला परम अकिंचन तपस्वी, सभी शास्त्रानुसारी, समान सिद्धान्त और समान विचारके होते रहे हैं ।