मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ मार्क्सवाद और रामराज्य अधर्मका विस्तार हुआ, तब इन्द्रियोपर नियन्त्रण भी कम हो गया । फिर तो राग-प्रवण मन सुन्दर परधन तथा परकलत्रादिके अपहरणमें प्रवृत्त होने लगा । तभी मात्स्यन्याय फैला और प्रजा उद्विग्न होकर नियन्त्रण एवं व्यवस्था चाहने लगी । तभी परमेश्वरानुगृहीत, चन्द्र-सूर्यादि अष्टलोकपालोके अंशोसे युक्त राजा- का प्रादुर्भाव हुआ और उसपर भी धर्मका नियन्त्रण हुआ । धर्म-नियन्त्रित राजा धर्म-प्रसार, दण्ड-विधान आदिद्वारा मात्स्यन्यायको हटानेमें समर्थ हुआ । वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु, मान्धाता, दिलीप, गाधि, अलर्क, शिबि, रन्तिदेव, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र, युधिष्ठिरादि राजा पूर्ण धर्म-नियन्त्रित, दयालु, परोपकारी और प्रजारक्षणार्थ अपना सर्वस्व बलिदान करनेवाले हो गये हैं । रामचन्द्रका प्रजारञ्जनार्थ सर्वत्याग प्रसिद्ध है । शिबि, रन्तिदेव आदि नरेन्द्रोने केवल प्रजाके ही नहीं, पशु-पक्षियोंतकके हितार्थ अपने राज्य, धन, प्राण—सब कुछका त्याग किया है। इन्हें शोषक एव अन्यायी कहना शुद्ध उच्छृङ्खलताका ही प्रदर्शन करना है । धर्म-नियन्त्रित राजा, जनप्रतिनिधियोका शासन ही ऐहिक, आमुष्मिक, अभ्युदय और परम निःश्रेयसका मार्ग प्रशस्त कर सकता है । उसके बिना मात्स्य-न्याय फैलता है । सभीका शासनमें भाग लेना सम्भव न होनेसे प्रतिनिधिकी कल्पना करनी पडती है । प्रतिनिधि मुख्यसे भिन्न होता ही है, किंतु वह मुख्यका अपेक्षित एव निश्चित कार्यकारी होता है । स्वेच्छात्मक संस्थाओ या अराजकतावादी सघको भी तो यूरोप या ससारके लिये प्रतिनिधि निश्चित करना ही पडता है । हाँ, प्रति निधि योग्य होना उचित है । अराजकतावादकी नींव है व्यक्ति और मार्क्सवाद- की नींव है समाज । प्रथम पक्षमे समूहकी स्वाधीनताकी पहली सबसे बड़ी शर्त है व्यक्तिकी स्वतन्त्रता । तदनुसार सब कुछ व्यक्तिकी स्वाधीनताके लिये ही होना चाहिये । दूसरे पक्षमें स्वाधीनताकी सबसे बड़ी शर्त है जनताकी स्वाधीनता, अतः सब कुछ जनताके लिये ही होना चाहिये । रामराज्यवादीकी दृष्टिमें व्यष्टि और समष्टिका अभेद है, अतएव दोनोका समन्वय ही सिद्धान्त है । समष्टिके द्वारा व्यष्टिको अभ्युदयकी सुविधा मिलती है और व्यष्टिके द्वारा समष्टिका निर्माण होता है । समाजवादी तथा अराजकतावादी दोनोंहीके सिद्धान्तोके आधारभूत इतिहास अल्प देशीय हैं । मार्क्सके अनुभवका क्षेत्र इग्लैण्डका श्रमिक आन्दोलन ही था । अधिक-से-अधिक फ्रास, जर्मनी तथा इंग्लैडके, तत्रापि लगभग ४०० वर्षतकके ही इतिहासपर उसका सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । अतः उसका क्या प्रामाण्य ?