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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 775, कुल 866 में से

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पृष्ठ 775

यह एक विरोधाभास है कि किसी संख्याके वर्गमूलको उसके वर्गफलके रूपमें प्रकाशित किया जाय, जैसे-क ३/२=√ २ इससे भी अधिककी कोई ऋणात्मक सख्या किसी संख्याका वर्ग हो सकती है; क्योंकि वर्गीकरणका यह साधारण नियम है कि ऋणात्मक संख्याका वर्ग धनात्मक होता है । लेकिन √ -१ गणितका एक आवश्यक अग है खडीकरण, फैक्टराइजेशनका उदाहरण क²+ख²=(क+ख ९—१ ) ( क-ख ९ ) । ‘भौतिक विज्ञानमें विरोधियोके ऐक्यका उदाहरण है अणु, स्वय तडितकी अणुमें क्रिया-प्रतिक्रिया नही है । लेकिन यह जिन अशोसे बनता है, उसमें एक धन तडितात्मक है, ‘प्रोटन’ और दूसरा ऋणतडितात्मक है, ‘इलेक्ट्रन’, जीवन तो सर्वथा विरोधमय है । वह हर समय कुछ है और कुछ अन्य भी है । ज्यो ही इस विरोधका अन्त होता है, जीवनका भी अन्त हो जाता है । विचारक्षेत्रमें यह विरोध विद्यमान है । मनुष्यकी ज्ञानशक्ति अपरिसीम है, लेकिन उसका वास्तविक ज्ञान सीमाबद्ध है । अब परिमाणके गुणात्मक परिवर्तनके कुछ उदाहरण ले लीजिये ।

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