मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 777, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ मार्क्सवाद और रामराज्य रूपसे परिणत होती है या एक देशसे ? सर्वरूपसे परिणत होती है, तब तो पूर्णरूपका सर्वथा त्याग होनेसे उसे तत्त्वान्तर ही कहना चाहिये । परन्तु ऐसा व्यवहार नहीं होता । यदि वस्तुके एकदेशका परिणाम होता है, तो प्रश्न होगा कि वह एकदेश वस्तुसे भिन्न है या अभिन्न ? भिन्न है तो उस वस्तुका परिणाम कैसे हुआ ? अभिन्न है तब तो एक देश भी वस्तुसे अभिन्न होनेसे उसका परिणाम वस्तुका ही सर्वरूपसे परिणाम हुआ । फिर भी पूर्वोक्त दोष ही होगा । कुछ लोगोंके मतानुसार एक देशको वस्तुसे भिन्नाभिन्न कहा जाता है, अर्थात् कारणरूपसे अभिन्न एवं कार्यरूपसे भिन्न । जैसे सुवर्णरूप कटक-कुण्डलादि अभिन्न हैं, परन्तु कटक-कुण्डलादिरूपसे भिन्न ही हैं। भेदाभेदका एकत्र होना विरुद्ध है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि प्रमाण- विपरीत प्रतीति ही विरोध है । जो वस्तु प्रमाणसे जैसी प्रतीत होती है, उसे तो वैसे उसी रूपमें मानना चाहिये । ‘कुण्डलमिदं सुवर्णम्’ यह कुण्डल सुवर्ण है, इस प्रकारके समानाधिकरणके प्रत्ययमें भेद, अभेद-दोनोंही प्रतीत होते हैं । यदि यहाँ सुवर्ण- कुण्डलका अत्यन्त अभेद हो तब तो दोनोंमेंसे किसी एककी ही दो बार प्रतीति होनी चाहिये । यदि दोनोंका अत्यन्त भेद हो तब तो सामानाधिकरण-प्रत्यय नहीं होना चाहिये । अश्व-गोका अत्यन्त भेद है । उनका सामानाधिकरण प्रत्यय नहीं होता । आधाराधेयभावमें ‘कुण्डे बदरम्’ ‘कुण्ड में बेर है’, ऐसा प्रत्यय होता है। ‘कुण्ड बेर है’, ऐसा प्रत्यय नहीं होता । एकाश्रयाश्रितोंमें भी सामानाधिकरण प्रत्यय नहीं होता अर्थात् एक आसनपर स्थित चैत्र-मैत्रमें चैत्र और मैत्र ऐसा प्रत्यय होता है । चैत्र मैत्र है, ऐसा प्रत्यय नहीं होता । अतः कार्यका कारणरूपसे अभेद होता है । इस तरहके असन्दिग्ध अबाधित सार्वजनिक अनुभवसे सद्रूपकारण सर्वत्र अनुगत है । इसलिये सद्रूपसे सबका अभेद है । गो, घट आदिमें कार्यरूपमे भेद है । ‘कार्यरूपेण नानात्व- मभेदः कारणात्मना । हेमात्मना यथाभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा ।’ परन्तु विचार करनेसे यह पक्ष अनुचित प्रतीत होता है । भेद क्या वस्तु है जो अभेदकेसाथ रहता है ? यदि अन्योन्याभावको ही भेद कहा जाय,तो भी यह देखना है कि क्या कार्य-कारण कुण्डल और सुवर्णमें यह अन्योन्याभावरूप भेद है ? यदि नहीं है, तब तो कार्य-कारणका अभेद ही हुआ, भेद नहीं हुआ । यदि है तब तो कार्य-कारणका भेद ही रहेगा, अभेद नहीं हो सकेगा । यदि कहा जाय कि भाव एवं अभावका विरोध ही नहीं, तो यह कथन भी ठीक नहीं । क्योंकि भाव-अभावका एकत्र अवस्थान नहीं होता । यदि दोनोंकी सहावस्थिति मानी जाय, तब तो कटक- कुण्डलका भी तात्त्विक ही अभेद होना चाहिये; क्योंकि आप भेद-अभेदकी एक साथ अवस्थिति मानते ही हैं, किञ्च यदि कटक हाटकसे अभिन्न है तो जैसे हाटक- रूपसे कटक-मुकुटादि अभिन्न हैं, वैसे ही कटकरूपसे भी कटक-मुकुटादिको अभिन्न होना चाहिये । क्योंकि कटक हाटकसे भिन्न है, इस तरह हाटक ही वस्तु ठहरती हैं, कटकादि नहीं ।