मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ मार्क्सवाद और रामराज्य क्योकि उनका ही अनुवेध कार्यमें होता है। बीजके विनाशका कारण यह है कि एक उपादान कारणमें एक कार्यकी अभिव्यक्ति होनेपर कार्यान्तरोकी निवृत्ति होती है। बीज भी एक अवयवोकी ही कार्यावस्था है। अङ्कुररूप कार्यकी अभिव्यक्तिसे उसकी निवृत्ति आवश्यक है। जहाँ पूर्व कार्यकी निवृत्ति आवश्यक नही है, वहाँ प्रतिषेधके प्रतिषेधका कोई अर्थ नहीं है। आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाश नही निवृत्त होता। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होती है, परंतु वायुकी निवृत्ति नहीं होती। मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है, किंतु मृत्तिकाकी निवृत्ति नहीं होती। आम्रादि वृक्षोसे फलोकी उत्पत्ति होती है, परंतु वृक्षोका नाश या प्रतिषेध नहीं होता। मनुष्य-पशु आदिसे ही दूसरे मनुष्य-पशु आदि उत्पन्न होते हैं, परंतु उत्पादकोका विनाश नही होता। भूतोकी उत्पत्तिका सिद्धान्त यह है कि कारण व्यापक, सूक्ष्म तथा स्वच्छ एव निर्गुण, निर्विशेष है। कार्य व्याप्य, स्थूल, अस्वच्छ, सगुण एव सविशेष है। परंतु साख्यमतानुसार कार्यकी विशेषताओंकी भी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नही। अत्यन्त असत्की उत्पत्ति नही होती— यह बात सत्कार्यवादके प्रसङ्गमे कही जा चुकी है। वेदान्तमतानुसार जो आदिमे तथा अन्तमें नही होती, मध्यमें प्रतीत होती है, वह वस्तु रज्जु-सर्प आदिके तुल्य सदसद्विलक्षण अतएव अनिर्वचनीय ही होती है। वह शुक्ति रजतादि मिथ्या पदार्थोंके समान होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है। आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः॥ (माण्डू०का०२।६) परिणाम- वादमे कारणको कार्याकारतया परिणत होनेके लिये कारणमे आवश्यक विचार होना ही चाहिये। एतावता अन्तर्विरोध या प्रतिषेध कार्यका कारण नहीं हो जाता। यदि प्रतिषेध कारण होता तो सर्वत्र वह सुलभ ही, है, फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारणोपादान ही व्यर्थ होगा। यदि प्रतिषेध ही कार्योत्पत्तिका कारण होता तो दग्ध बीजसे भी कार्योत्पत्ति होनी चाहिये थी, क्योंकि दाहसे भी बीजका प्रतिषेध हुआ ही। हम स्पष्ट देखते हैं कि कार्यके लिये कार्यार्थी तत्कारणोंका अन्वेषण करते हैं। वेदान्तानुसार कारण ब्रह्म ही अनिर्वचनीय माया एवं तदंश विभिन्न उपाधियों- द्वारा कार्याकारेण विवर्तित होता है। अंडे भी पतंगोके फल हैं, प्रतिषेधरूप नहीं। कहा जाता है कि मूल वस्तुके अन्तर्विरोध ( विध्वंस ) से समन्वयद्वारा वस्त्वन्तरकी उत्पत्ति होती है—'नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्' विनष्ट बीजसे ही अङ्कुर उत्पन्न होता है। मृतपिण्डके उपमर्दनसे ही घट निर्माण होता है। विनष्ट क्षीरसे ही दधिका निर्माण होता है। यदि कूटस्थ कारणसे ही कार्य उत्पन्न हो तब तो अविशेषेण सभीसे सब कार्यकी उत्पत्ति होने लगे। अर्थात् कूटस्थ कारणका यदि कार्य-जनन स्वभाव है तब तो तत्काल ही उससे कार्य उत्पन्न होना चाहिये, कालक्षेप न होना चाहिये। यदि कूटस्थ कारणमे कार्यजनक स्वभाव नहीं है, तब उससे कभी भी कार्य न उत्पन्न होना चाहिये। यदि कहा जाय कि समर्थ होते हुए भी