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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 800

मार्क्स-दर्शन ५८७ इसपर वेदान्तीका कहना है कि मृदादि कारणोंसे घटादिकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डादिकी निवृत्ति हो जानेपर भी मिट्टी आदि कारणकी घटादिमें अनुवृत्ति रहती है। अतः पिण्डादिके विनष्ट होनेपर भी मृदादि कारणका विनाश नहीं हुआ। असद्वादी कहते हैं कि 'यद्यपि मृत्तिकादि कारण पिण्डादिके नष्ट होनेपर नष्ट हो गया, घटादिमें मृत्तिकादि कारणका अन्वयदर्शन कारणकी अनुवृत्तिसे नहीं, अपितु सादृश्यके कारण है। पिण्डगत मृत्तिकासे घटगत मृत्तिका भिन्न है, फिर भी सादृश्य- के कारण अभेद प्रतीतिसे अन्वयदर्शन-सा होता है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योकि पिण्डादिगत मिट्टी आदिकोंके अवयवोंका ही घटादिमें प्रत्यक्ष अनुभव होता है । अतः पिण्डगत मृत्तिकासे घटगत मृत्तिका भिन्न है—यह प्रत्यक्ष नहीं है, किंतु 'यत् सत् तत् क्षणिक यथा दीपं सन्तञ्चेमे भावाः' जो सत् है वह क्षणिक होता है जैसे दीप, और सभी पदार्थ सत् हैं; अतः वे क्षणिक होने चाहिये । इस अनुमानसे मृदादिकारणोंकी भी क्षणिकताका अनुमान करके ही भेद सिद्ध किया जा सकता है। परंतु 'सैवेयं मृत्तिका' वही यह मिट्टी है—इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष पहचानसे विरुद्ध होनेके कारण यह अनुमान अग्निके अनुष्णत्वानुमान- के समान अनुमानाभास है। कहा जा सकता है कि 'प्रत्यक्ष-प्रमाणसे कारणकी एकता प्रतीत होती है और अनुमानसे भेद प्रतीत होता है, अतः जैसे प्रत्यक्षसे विरुद्ध होनेके कारण अनुमानको अनुमानाभास कहकर अप्रमाण घोषित किया जाता है, वैसे ही अनुमानविरुद्ध प्रत्यक्षको ही प्रत्यक्षाभास कहकर अप्रमाण क्यों न घोषित किया जाय ?' परंतु यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक ही हुआ करता है, अतः अनु- मानद्वारा प्रत्यक्ष न होनेसे प्रत्यभिज्ञासिद्ध प्रत्यक्षका विरोध उपजीव्यविरोध ठहरता है। इसलिये अनुमान दुर्बल है। अन्यथा यदि अनुमानसे प्रत्यक्ष बाधित होगा तब तो सर्वत्र ही अनाश्वास होगा। कहा जा सकता है कि प्रत्यभिज्ञा स्वार्थमें स्वतःप्रमाण नहीं हो सकती, किंतु दूसरी बुद्धियोंके संवादसे ही उसका प्रामाण्य हो सकता है, परंतु स्थायित्व-साधक दूसरी कोई बुद्धि नहीं है, अतः 'प्रत्यभिज्ञासिद्धः प्रत्यभिज्ञायमानः' अर्थ भी क्षणिक ही है। परंतु यह भी कहना ठीक नही, क्योकि इस तरह तो अनुमान-सिद्ध क्षणिकत्वबुद्धि भी स्वार्थमे स्वतः प्रमाण न होनेसे उसे भी तादृग् दूसरी बुद्धिकी अपेक्षा होगी। उस दूसरी बुद्धिको भी अपने प्रामाण्यके लिये तादृक् तीसरी बुद्धिकी आवश्यकता होगी—इस तरह अनवस्था प्रसङ्ग होगा। अतः प्रत्यभिज्ञाके प्रमाण-बुद्धिका स्वतः प्रामाण्य ही अङ्गीकार करना ठीक है। इस दृष्टिसे प्रत्यभिज्ञान भी स्वतः प्रमाण है। जो कहते हैं कि प्रत्यभिज्ञा भी सादृश्यके कारण भ्रमरूप है। 'त एवेमे केशाः' —ये वही बाल हैं, इत्यादिस्थलोमे बालोकी भिन्नता रहनेपर भी सादृश्यके कारण

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