भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४९२ मार्क्सवाद और रामराज्य उपर्युक्त उदाहरण भी वस्तुतः प्रतिषेधके प्रतिपेधका नही। धन-ऋणका बढाव-घटावके रूपमें विरोध होनेसे यद्यपि धनका प्रतिषेध ऋणको कहा जा सकता है, ऋणके गुणनसे निकलनेवाले फलभूत वर्गफल सख्याको भी प्रतिषेधका प्रतिषेध कहा जा सकता है। परंतु केवल वह धनके रूपमें ही मूल सख्याके रूपमें है, वस्तुतः उसका रूप पृथक्-पृथक् है। जैसे अङ्कुर-कारणभूत यवका दाना और अङ्कुरका फलभूत यवके दाने पृथक्-पृथक् हैं। संख्यानुगणितका भी उदाहरण, इस सम्बन्धमें अनुकूल नही है। मूलका प्रतिषेध शून्यवत् ‘क’ अवश्य प्रतिषेधका प्रतिपेध है। उनके निर्धारित परस्पर सम्बन्धके आधारपर उसके प्रतिषेधसे मूलपर पहुँचते हैं, परंतु यह अपेक्षा-बुद्धि- की ही कलाबाजी है। इससे प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रतियोगी सत्त्व-व्यवस्थापन-जैसी कोई चीज नही निकलती। एक अपेक्षा-बुद्धिमे वही वस्तु पहली या दूसरी, छोटी या बडी हो सकती है, परंतु वस्तुतः वह विरोधात्मक नही हो सकती। ऐतिहासिक द्वन्द्ववाद कहा जाता है कि 'इतिहासके लिये भी यही बात लागू है। सब सभ्य जातियोका, जो एक निर्दिष्ट अवस्थाको पार कर चुकी हैं। आरम्भ भूमिके सामूहिक स्वामित्वसे होता है। कृषिके विकासके लिये एक स्तरपर भूमि- का सामूहिक स्वामित्व उत्पादन-क्रियाके लिये बाधकस्वरूप बन जाता है। इसका अन्त किया जाता है, इसका प्रतिषेध होता है और कुछ बीचके स्तरोको पारकर व्यक्तिगत सम्पत्तिमें रूपान्तरित हो जाता है, व्यक्तिगत सम्पत्तिसे ही कृषिका ऊँचे स्तरपर विकास होता है, लेकिन व्यक्तिगत सम्पत्ति ही आगे चलकर कृषि-उत्पादनकी क्रियाके लिये बाधकस्वरूप हो जाती है। अब इसके प्रतिषेध- की और भूमिपर सामूहिक स्वामित्वकी माँग होने लगती है, लेकिन यह मूल- रूपसे बहुत भिन्न होगा, जिसमें आधुनिक आविष्कारोका पूरा उपयोग किया जा सकेगा।' पर यह कहना भी सङ्गत नहीं है। भूमिपर सामूहिक स्वामित्व ऐतिहासिक नहीं है। ईश्वर-निर्मित भूमि ईश्वरकी थी। बलिकी पत्नी विन्ध्यावलिने भगवान वामनसे कहा था कि आपने क्रीड़ाके लिये ही जगत्की रचना की है, परंतु दुर्बुद्धि- लोग उसे अपना समझने लगते हैं। आप सर्वकर्ता हैं, आपहीद्वारा जीवोंमें भी कर्तृत्व सफल होता है, फिर बलि आदि आपको क्या दे सकते हैं— क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः । कर्तुः प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥ (श्रीमद्भा० ८।२२।२०)