भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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हेगेलके तर्कशास्त्रका यही गुण है कि वह विरोधियोंके एकत्वको मानता है और उनको श्रेणीबद्ध करता है । 'तर्कसिद्धके रूपमें, एक ओर पूर्णरूपसे व्यापक और दूसरी ओर पूर्णरूपसे एक । हेगेलीय भाषामें दो विरोधियों—उद्जन, अम्लजन— का एकत्व ही पानी है। ये तर्ककी दृष्टिमें विरोधी हैं। उन दो विरोधियोंके मेलसे जो पानीरूप वस्तु बनती है वह न उद्जन है और न अम्लजन । गुणात्मकरूपसे दोनोंका अन्तर्धान हो जाता है और बिल्कुल नये गुणोंके संयोगकी सृष्टि हो जाती है । परिणाम तो उतना ही रहता है, लेकिन रूप परिवर्तित हो जाता है।' उपर्युक्त कथन भी निःसार है । यह तो अध्यात्मवादमें ही स्वीकृत है कि वस्तुओंमें सामान्य-विशेषभाव एवं साधर्म्य-वैधर्म्य विभिन्नरूपसे मान्य होते हैं । जाति एवं गुणकी दृष्टिसे समष्टि-व्यष्टिका उपर्युक्त विवेचन भ्रान्तिपूर्ण है । नित्य एक एव अनेकोंमें समवेत जाति है । जैसे अनेक गोव्यक्तियोंमें एक गोत्वजाति रहती है, उसीके आधारपर सभी गोव्यक्तियोंको जाना जाता है, परंतु गण या समूह तो विशेषों (नैयायिकस्वीकृत पदार्थ) का भी कहा जा सकता है, जिनमें जाति नहीं है। अनेक जातिके मनुष्योंके समूहको भी गण कहा जा सकता है, परंतु उन्हें एक जातिका नहीं कहा जा सकता यह प्रसङ्ग ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व आदि अवान्तर जातिका है । मनुष्यत्व जाति तो सभी मनुष्योंमें होती ही है । व्यष्टि और समष्टि अध्यात्मवादमें वृक्ष और वनके तुल्य है । व्यष्टित्व और समष्टित्वका तो भेद होता ही है । ऐसे अनेक गुणधर्म समष्टिमें मान्य होते हैं, जो व्यष्टिमें नहीं होते । जैसे-एक-एक तन्तुओंसे शीतापनयन नहीं होता, परंतु वही तन्तु-समुदाय पटरूपमें परिवर्तित होकर अङ्गप्रावरण, शीतापनयन आदि कार्य करते हैं। व्यक्ति-समुदायसे भिन्न होकर समष्टि कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है । जिन तत्त्वोंसे जिस वस्तुका निर्माण होता है उन तत्त्वोंका किसी-न-किसी रूपमें उस वस्तुमें बना रहना स्वाभाविक है । कर्त्ता, निमित्त आदिके बिना भी कार्य रह सकता है, परंतु उपादान या समवायी कारण बिना तो कार्यकी स्थिति सम्भव ही नहीं होती । कोई नियम तभी निर्दोष माना जाता है, जब वह अव्याप्ति- अतिव्याप्ति आदि दोषोंसे रहित हो । ब्राह्मणत्व मनुष्यत्वका व्याप्य धर्म है, सुतरां व्यापक धर्मके बिना व्याप्य धर्मकी अवस्थिति नहीं हो सकती । जैसे क्षितित्व, जलत्व आदि द्रव्यत्व-व्याप्त धर्म है । अतः क्षितित्व, जलत्व आदि द्रव्यत्वके बिना नहीं रह सकते । विभिन्न विशेषोंमें ही सामान्यका पर्यवसान होता है । वस्तुतः जिस रूपमें आक्सीजन और हाइड्रोजन जलके जनक होते हैं; उस रूपमें वे विरोधी नहीं हैं । यद्यपि अग्नि और तेल किसी रूपमें विरोधी हैं;