मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० मार्क्सवाद और रामराज्य सद्गुणोसे सम्पन्न एक निर्दोष विरजा (रजोगुणसे रहित) राजा निर्माण करके दिया। ततः संचिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः। तैजसं वै विरजसं सोऽसृजन्मानसं सुतम्॥ (८८) वह राजा प्रभुत्व-निरपेक्ष होकर त्याग-वैराग्यकी ही ओर रुचि रखता था। उसका पुत्र कीर्तिमान् और पौत्र कर्दम हुआ। क्रमेण अग, फिर वेन राजा हुआ। वह उत्पथगामी था। इसीलिये ऋषियोंने उसे पदच्युत कर दिया और अभिमन्त्रित कुशोंसे मार डाला। उसका पुत्र पृथु हुआ। वह बहुत ही योग्य एवं धर्मात्मा हुआ। उसने ऋषियोंसे प्रार्थना की कि मुझे आपलोग आज्ञा दें, क्या करूँ। ऋषियोंने उससे प्रतिज्ञा करायी 'तुम नियत होकर, निःशङ्क होकर धर्मका आचरण करो। स्वयं प्रिय, अप्रिय छोड़कर सब काम-क्रोध, लोभ एवं मानको दूरसे ही त्यागकर सब प्राणियोंका समानरूपसे हिताचरण करो। जो भी धर्मसे विचलित हो शास्त्रधर्मके अनुसार उसका निग्रह करो और यह भी प्रतिज्ञा करो कि मन, वचन, कर्मसे तुम भौम ब्रह्म (पृथ्वीके ब्राह्मणो) की रक्षा करोगे। जो भी धर्मनीतियुक्त होगा, निःशङ्क होकर उसका पालन करोगे और मनमानी कुछ न करोगे। यह भी प्रतिज्ञा करो कि ब्राह्मणोंको प्राणदण्ड नहीं दोगे और सभी लोकोंको साङ्कर्यसे बचाओगे।' पृथुने वैसी ही प्रतिज्ञा की और कहा कि 'ब्राह्मण सदा ही हमारे नमस्य होंगे।' इस तरह परस्पर वचनबद्ध होकर राज्य व्यवस्थित किया गया। इसे ही 'सोशल कन्ट्राक्टस' कहा जा सकता है। शुक्राचार्य पृथुके पुरोहित हुए। बालखिल्य ऋषिगण मन्त्री हुए। देवताओ तथा इन्द्रके साथ विष्णुने पृथुका अभिषेक किया। पृथुने प्रजाका रञ्जन किया और इसलिये वे राजा कहे गये— तमब्रुवँस्तत्र देवास्ते ते चैव परमर्षयः। नियतो यत्र धर्मो वै तमशङ्कः समाचर॥ प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु। कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः॥ यश्च धर्मात् प्रविचेलेल्लोके कश्चन मानवः। निग्राह्यस्ते स्वबाहुभ्यां शश्वद् धर्ममवेक्षता॥ प्रतिज्ञां चाविरोहेस्व मनसा कर्मणा गिरा। पालयिष्याम्यहं भौमं ब्रह्म इत्येव चासकृत्॥ यश्चात्र धर्मो नित्योक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रयः। नमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन॥ अदण्ड्या मे द्विजाश्चेति प्रतिजानीहि हे विभो। लोकं च सङ्करान् कृत्स्नं त्रातास्मीति परंतप॥