भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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मार्क्स-दर्शन ५२५ भौतिकवाद और यान्त्रिक भौतिकवादका भेद भी अवास्तविक है । एकता- अनेकता, युक्तता-अयुक्तता, विच्छिन्नता-अविच्छिन्नताका विचार काल्पनिक नहीं है । इन विचारोंके बिना वस्तुयाथात्म्यका बोध असम्भव ही है । समूचे शरीरको ही मनुष्य या आत्मा मान रखना अविवेकका पूरा परिचय है । जैसे ईंट, चूना, पत्थर, काष्ठ आदिसे बना हुआ मकान एक सङ्घात है, वह किसी अपनेसे असंहत भोक्ता चेतनके लिये होता है, वैसे ही माता-पिताके शुक्र, शोणितसे बना हुआ अस्थि, मांस, चर्ममय पंजर देह भी मकानके समान ही किसी अपनेसे असंहत, असङ्ग चेतनके लिये होना चाहिये । अचेतनके सभी व्यवहार चेतनके दुःख-निवृत्ति सुखप्राप्तिके लिये होते हैं । वैसे ही देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, दिल, दिमाग आदिकी प्रवृत्तियाँ भी किसी चेतनके सुखार्थ मानना युक्तियुक्त है । इसे काल्पनिक कहना अनुचित है । अतएव मानसिक क्रियाको क्रियाशील मानना भी अनभिज्ञता है । गुण और क्रिया स्वयं ही द्रव्याश्रित होते हैं । जैसे गुण गुणका आश्रय नहीं होता, वैसे ही क्रिया भी क्रियाका आश्रय नहीं होती है । वस्तुतः मानसिक क्रिया भौतिक है—यह भारतीय अध्यात्मवादी भी मानते हैं । ब्रह्मात्मक ज्ञान नित्य- ज्ञान है, वह विभिन्न मानसिक क्रियाओंका भी निर्विकार भासक है । मानसी क्रियाओंकी विशेषता स्पष्ट है, नित्य ज्ञान क्रिया नहीं है, अध्यात्मवादी इसे प्रति- बिम्बरूप मानते ही नहीं । ‘फिर निष्क्रिय प्रतिबिम्ब नहीं है’—यह कथन भी अनुक्तोपालम्भ है । विकासमान भूतकी सम्बन्धित पूर्णता या जीवित मनुष्योंके बीच व्यावहारिक सम्बन्धका परिणाम ही ज्ञान है—यह कथन मानसिक क्रियारूप ज्ञानके सम्बन्धमें कहा जा सकता है, परन्तु नित्यज्ञानके सम्बन्धमें ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ज्ञानका प्रागभाव या प्रध्वंसाभाव नहीं सिद्ध होता, क्योंकि भाव, अभाव किसी वस्तुके ग्रहणके लिये ज्ञान आवश्यक ही है । ज्ञानको स्वभावका ज्ञापक कहना ‘वदतोव्याघात’ है । जैसे महाकाशमें घटादि उपाधिद्वारा परिच्छिन्नता और अनेकता प्रतीत होती है, वैसे ही विषयों एवं मानसी वृत्तियोंके कारण नित्य ज्ञानमें भी परिच्छिन्नता तथा अनेकता प्रतीत होती है । वस्तुतः निरुपाधिक अनन्त आकाशके तुल्य ही निरुपाधिक ज्ञान भी नित्य एवं अनन्त है । अपरप्रेरित जडपदार्थोंमें स्वतः सर्जनकी शक्ति नहीं होती । विज्ञानसे भी नहीं सिद्ध होता कि किसी चेतन मनुष्यके प्रयत्नके बिना जडपरमाणु, जडविद्युत्कण, जडभूत या प्रकृति गतिशील होनेपर भी नियमित तथा अनुकूल गति बनाकर अभीष्ट कार्य-सिद्धि कर सकेंगे । जल तथा वायु गतिशील हैं, फिर भी कार्यसिद्धिके अनुकूल गतिशील बनाना चेतनका ही कार्य है । इसी तरह गतिशील भूतोंको भी नियामक चेतनकी