मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयान्त्रिक सिद्धान्त लागू है सही, लेकिन जिनका नियन्त्रण और उच्चकोटिके नियमोंद्वारा होता है। उसकी दूसरी सकीर्णता यह है कि वह विश्व ससारको सक्रियरूपमें भूतके ऐतिहासिक विकासके रूपमें नहीं देखता । प्रकृतिकी अविराम गतिका ज्ञान तो लोगोंको था, लेकिन उस समयके विचारके अनुसार यह गति अनन्तकालसे एक चक्रके आकारमें है और उन्हीं परिणामोंका बारवार आविर्भाव होता रहता है । यान्त्रिकवाद एक यन्त्रचालकका अनुमान करता है और इस प्रकार ईश्वर और अप्रकृतिवादकी पुनः सृष्टि करता है । वास्तविक परिवर्तनकी व्याख्या यह नहीं कर सकता । वास्तविक परिवर्तनका कारण है वस्तुकी स्वयंगति । द्वन्द्वमानके संक्षित सूत्र १६ हैं—हीगेलके तर्कशास्त्रके ऊपर लेनिनने १६ सूत्रोंका विस्तार किया है, जिनके अध्ययनसे द्वन्द्वमानको समझनेमें बहुत सहायता मिलती है । लेनिनके शब्दोंमें द्वन्द्वमानका सक्षित विवरण है, विरोधियोंका एकत्व । एक प्रकारसे ये सोलहों सूत्र इसीके विशद विस्तार हैं । मनन-क्रियाका आरम्भ होता है, विश्व-प्रक्रियासे । उसके कुछ विशिष्ट गुणोंको अलग करके उनके अलग रूपको ही ध्यानमें लाकर वस्तु ( कर्म ) को लेकर ही मनन-क्रियाका आरम्भ है । इसलिये द्वन्द्वात्मक मनन-क्रियाके लिये पहले आवश्यक है, वस्तुओंको ज्यों-की-त्यों उनके अलग रूपमें देखना । यही लेनिनका पहला सूत्र है—वस्तुनिरीक्षण । “लेकिन वस्तुतत्त्वके तोडनेके पहले क़दमको पूरा करना पड़ता है । दूसरे क़दमसे इस द्वन्द्वमानका पुनर्निर्माण करके यदि विश्व ससार एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है, जिसके अङ्ग परस्पर सम्बन्धित हैं तो हम इनकी पहचान यों करते हैं कि मस्तिष्कमें इन आंशिक क्रियाओंको, यथा समाज उत्पादनके साधन परिवर्तनशील वस्तु शब्दको अलग कर लेते हैं । इनका हम नाम देते हैं— पृथकित ( आइसोलेट्स ) । यह पृथकित, पारिपार्श्विक अवस्था ( बहिरावेष्टन ) या स्थान, काल, भूतसे अलग कर लिया गया है। इसलिये स्वयं पृथकित एक कल्पनामात्र है, क्योंकि द्वन्द्वात्मक दृष्टिसे पारिपार्श्विक अवस्थासे मुक्त कोई वस्तु रह नहीं सकती । लेकिन यह कल्पना भी वास्तविक ही है, इसलिये कि वस्तु- राज्यमें इसका अस्तित्व है । द्वन्द्वमानके अध्ययनका पहला कदम है इन पृथकितोंका स्वतन्त्ररूपसे अध्ययन करना और फिर उनको अपनी पारिपार्श्विक अवस्थासे संयुक्तकर द्वन्द्वमानका पुनर्निर्माण करना । इसी प्रकार हम अति- भौतिकवादी अलाहिदापने और एकतरफापनेके ऊपर उठ सकते हैं और दुनियाको एक अन्तःसम्बन्धित गतिके रूपमे देख सकते हैं । यही लेनिनका दूसरा सूत्र है । हमें प्रत्येक वस्तुके दूसरे वस्तुओंसे सम्बन्धोंकी विचित्रता और परिपूर्णता का विचार करना चाहिये ।”