भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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हवामें नमीकी कमी है, आवपाशीसे काम लिया जाता है । पशु और वनस्पति जगत्से नये रूपमे प्राप्त होते हैं, क्योकि इनके नये किस्मकी सृष्टि होती रहती है । यदि इतना होते हुए भी पूँजीवादी समाजमे प्राकृतिक परिवर्तन इतना सीमित है तो इसका कारण प्रकृति और समाजके विरोधमें नहीं मिलेगा, बल्कि पूँजीवादी उत्पादक सम्बन्धोमें मिलेगा जो उत्पादक-शक्तियोका पूरा-पूरा विकास नहीं होने देता । समाजवादमें ही यह प्राकृतिक परिवर्तन पूर्णरूपमें सम्भव है, जिसमे मुनाफ़ाके लिये नहीं, उपभोगके लिये पदार्थ बनाये जाते हैं। "किसी वस्तुकी मूल गति ही उसके गुणका निर्देश करती है। भूत अपनी गतिसे ही असख्य गुणोकी सृष्टि करता है । मनुष्य, सामान्य जीवनकोष, जड पदार्थ—सभी एक ही भौतिक विकासकी चढती सीढ़ीके कदम हैं और ये कदम भिन्न गुणसम्पन्न हैं । प्रत्येक गतिमें यान्त्रिक गति सम्मिलित है और इसके कारण भूत कणोंकी सजावटमे भिन्नता आ जाती है । इन यान्त्रिक गतियोको समझना विज्ञानका पहला काम है; लेकिन यह केवल पहला ही कदम है। यान्त्रिक गतिसे व्यापक गतिका अन्त नहीं हो जाता । गति केवल स्थान- परिवर्तनमात्र नहीं है। यन्त्र-राज्यसे ऊपर यह गुणका भी परिवर्तन है। यान्त्रिक गति हर उच्च प्रकारकी गतिका एक आवश्यक अङ्ग है, यद्यपि यह गतिके और गुणोंकी भी सृष्टि करती है। रासायनिक क्रियाके साथ उत्ताप और वैद्युतिक परिवर्तनका निरन्तर संयोग है । सावयव जीवन बिना यान्त्रिक, कणिक, रासायनिक उत्ताप और बिजली सम्बन्धी परिवर्तनोके असम्भव है । लेकिन प्रत्येक क्षेत्रोमें इन समवर्तमान रूपोसे मूलरूपके तत्त्वका भडार चुक नहीं जाता । "इसमें कोई सदेह नही कि विशिष्ट गुणसम्पन्न भूतकी नयी अवस्थाका आविष्कार गतिके एक नये प्रकारका आविष्कार होगा । परिणामकी वृद्धिसे वस्तुविशेषका गुण अपने विपरीतमें परिवर्तित हो जाता है। जैसे, निर्विरोध प्रतियोगिता पूँजीवादका और साधारणतः पण्य-उत्पादनका मौलिक गुण है। एकाधिकार इसका ठीक उल्टा है । लेकिन हम अपनी आँखके सामने प्रतियोगिताको एकाधिकारमें रूपान्तरित होते देख रहे हैं, जिससे बड़े पैमानेपर उत्पादनकी सृष्टि होकर छोटी फैक्टरियाँ दबती जा रही हैं और उत्पादन बड़े-से-बड़े पैमानेपर होकर अन्तमें पूँजी और उत्पादनका इस प्रकार एकत्रीकरण हो जाता है कि इसका परिणाम एकाधिकार हो जाता है।" (लेनिनका साम्राज्यवाद) वस्तुतः समाज और प्रकृतिमें विरोध नहीं होता, क्योकि प्रकृतिद्वारा समाजका विकास एवं उपोद्वलन होता है; प्रकृतिसे ही सम्पूर्ण प्रकारकी सुविधा