मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 857, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें५३४ मार्क्सवाद और रामराज्य "सम्बन्ध की चेतना ही ज्ञान है, विशेषकर वस्तु-जगत्के अस्तित्वोंके बीचका तथा आत्मानुभूत (दृष्टिगत वस्तु, कल्पनाएँ आदि) अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध तथा इन दोनों जगतोंके बीचके सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है। एक और दृष्टिकोणसे व्यावहारिक अर्थमें विचार वस्तु-जगत्को ठीक-ठीक प्रतिफलित और प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है। भौतिकवादने प्रकृतिकों क्रियाशील रूपमें माना और विचारको अक्रिय रूपमें, जिसका केवलमात्र काम था इन्द्रियग्राह्य वस्तुओंको ग्रहण करना तथा उसपर मन्थन करना। यह कान्ट और कान्टके पश्चात्के आदर्शवादी थे जिन्होंने मननशक्तिकी रचनात्मक क्रियापर जोर दिया, लेकिन इतना अधिक जोर दिया कि उसको बेहिसाब बढ़ा-चढ़ा दिया। "अंग्रेजी और फ्रांसीसी भौतिकवादने उस मूक स्वीकृतिसे आरम्भ किया कि विचारकी वस्तु (विचारका कर्म) का अस्तित्व विचारकर्ताके अस्तित्वसे पहले है और विचारकर्ता इसकी अनुभूति प्राप्त करता है। लेकिन वह इससे आगे न बढ़ सके। हमास् हवम् ने इस मतको इन शब्दोंमें रखा है। 'मनुष्यके विचारके सम्बन्ध- में, अलग-अलग रूपमें इनमेंसे प्रत्येक वस्तु, हमारे शरीर और मनके बाहर किसी वस्तुके किसी गुणका प्रतीक या प्रतिनिधि है, जो वस्तुकी मनुष्यकी इन्द्रियों- पर अपनी क्रियाकी विचित्रतामे विविध दृश्योंकी सृष्टि करती है (लिवायथन)। यह प्रश्न भौतिकवादियोंके सामने इस रूपमें था कि इस ज्ञानकी उत्पत्ति इन्द्रियग्राह्य रूपोंके मूल उद्गमस्थानसे होकर एक विशेषशक्ति प्रज्ञाद्वारा होती है, लेकिन यह विशेषशक्ति क्या है, यही एक झगड़ेका विषय हो गया। आदर्शवादी इस मतका पोषण करते थे कि यह 'प्रज्ञा' धर्मपण्डितोंकी आत्मा ही है जो एक अतिप्राकृतिक शक्ति है, जो इन्द्रियानुभूत मायावी रूपोंको परम और अनन्त सत्य- में परिणत करती है। भौतिकवादी इस मतके लिये झगड़ते रहे कि यह 'प्रज्ञा' कितनी ही रहस्यमयी हो, फिर भी यह प्राकृतिक ही है। प्रसिद्ध लेखक आनातोल फ्रांसने परिस्थितिको इस तरह चित्रित किया है 'मठकी दीवारके नीचे जहाँ छोटे बच्चे अपना खेल खेल रहे थे, हमारे साधुमित्र वहाँ एक और खेल खेल रहे थे जो उतना ही व्यर्थ था, लेकिन मै वहाँ जा मिला क्योंकि समय बिताना ही चाहिये। हमारा खेल शब्दोंका खेल था जो हमारे गूढ़ मगज लेकिन सूक्ष्म दिमागके लिये सुखकर था, एक विचारशैलीको दूसरी विचारशैलीके विरुद्ध उभारनेवाला था और उसने सारे ईसाई समाजमें हलचल मचा दी। हम दो विरोधी दलोंमें बँट गये। एक दलका कहना था कि सेबों (फल) के पहले सेव