मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतएव सम्बन्ध-सम्बन्धीका आधाराधेय भाव होता है। जैसे घट-ज्ञान पट-ज्ञान- का लक्षण नहीं होता, उसी तरह वस्तु-सम्बन्ध-ज्ञान वस्तु-ज्ञानका लक्षण नहीं हो सकता। इसी प्रकार बाहरी दुनियाके व्यापक और विशिष्ट तफसीलोंके बीचका सम्बन्ध भी ज्ञान नहीं कहा जा सकता। सम्बन्ध द्विष्ठ होता है; अर्थात् दो सम्बन्धि- योंमें रहता है, जैसे संयोग। जिन दो वस्तुओंका संयोग होता है, उन दोनोंमें ही सम्बन्ध रहता है। ज्ञान आत्मामें ही रहता है। इसके अतिरिक्त सम्बन्ध स्वयं ही ज्ञेय पदार्थ है, उसका भी ज्ञान होता है, फिर वह स्वयं ही ज्ञान कैसे हो जायगा ? इसी तरह 'दृष्टिभूत वस्तु तथा उसकी कल्पनाके बीचका सम्बन्ध जिसमे और जिसके द्वारा हम अस्तित्वका अनुभव करते हैं वह ज्ञान है', यह भी कहना गलत है। क्योंकि अनुभव भी तो ज्ञान ही है। चेतना, अनुभव, ज्ञान आदि पर्यायवाची शब्द हैं। उसी वस्तुका लक्षण करनेमें उसीका उपयोग होना अयुक्त है। 'अपने और बाहरी दुनियाके बीच समता और प्रभेद दोनोंका जिन दृष्टिभूत वस्तुओं और उनकी कल्पनाओंमें अनु- भव करते हैं वह ज्ञान है', यह भी कहना अपर्याप्त है, क्योंकि दृष्टि और उनकी कल्पनाओंका भी अन्तर्भाव ज्ञानमें ही है। अतः जबतक ज्ञान या अनुभव या चेतनाका स्पष्ट लक्षण न हो जाय तबतक इन वाक्याडम्बरोंसे काम नहीं चल सकता। इसी तरह 'मनन-क्रियाकी भीतरी दुनियामें विचित्र प्रकार एवं परिमाणकी समता और प्रभेदका मान चित्रमें चित्रित कर सकना और इन सबको सम अस्तित्व और अनुवर्त्तनक्रिया, प्रतिक्रिया, परस्परक्रिया और कार्य-कारण निर्भरताके उचित सम्बन्धोंमें सजाने तथा व्यवस्थित करनेका नाम ही ज्ञान है', यह कथन भी शब्दा- डम्बरको छोड़कर कुछ नहीं है। वस्तुतः कल्पना, मनन-क्रिया, चित्रण करना, सजाना आदि क्रिया कर्तृतन्त्र ही होती है, परंतु ज्ञान तो कृति और इच्छासे भी पहले होता है। इसीलिये 'जानाति, इच्छति, अथ करोति' का व्यवहार होता है। अर्थात् कोई भी प्राणी जानता है, फिर इच्छा करता है, पुनश्च कर्म करता है। प्राणी जैसा संकल्प करता है, वैसी ही क्रिया करता है-यह पीछे कहा जा चुका है। कोई भी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, कर्त्ताके परतन्त्र ही होती है। किंतु ज्ञान कर्त्ताकी इच्छापर निर्भर नहीं होता; प्रमाणकी उपस्थितिमें कर्त्ताकी इच्छा न होनेपर भी ज्ञान होता है। दुर्गन्ध-ज्ञानको हम नहीं चाहते तब भी निर्दोष घ्राणकी उपस्थितिमें दुर्गन्ध रहनेपर ज्ञान अनिवार्य ही है, यहाँ कर्त्ताकी स्वतन्त्रता नहीं होती है। मानस परिणाम होनेपर भी मनन-क्रिया, भावना एवं ज्ञानमें यही भेद रहता है। बाहरी दुनियाकी वास्तविकता और भीतरी दुनियाकी समता तथा भिन्नताका मनमें चित्रण करना ज्ञाता या प्रमाताका काम हो सकता है। इन