मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यक्तिवाद ७३ व्यापार करनेके लिये व्यक्तिवादके आधारपर व्यापारियोंने संघर्ष किया था । इंगलैंडमें इसके लिये एक बड़ी पूँजी देनी पड़ी थी । कहीं-कहीं लड़ाइयाँ भी लड़नी पड़ी थीं। दार्शनिकोंने भी यह प्रतिपादन किया कि आर्थिक प्रगतिके हेतु राज्यका आर्थिक एवं सामाजिक विषयोंमें हस्तक्षेप करना उचित नहीं । इन विषयोंमे व्यक्ति को पूर्ण स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये । इसी आधारपर १९ वीं सदीमें ब्रिटेनमे औद्योगिक क्रान्ति हुई और उसके नेता पूँजीपति ही थे । ब्रिटेनमें उनका ही प्राधान्य था । सामन्तों एव श्रमिकोसे सघर्ष लेकर वे लोग सफल हुए थे । अर्थशास्त्र, उपयोगितावाद, मिलकी स्वतन्त्रता एव स्पेन्सरके जीवशास्त्रके आधारपर व्यक्तिवादका प्रचार बढा । ब्रिटेनमें अर्थशास्त्रके चार प्रमुख दार्शनिक हुए । आरम्भमें स्मिथ ( १७२३-९० ) हुए । उनकी पुस्तक 'राष्ट्रोंकी सम्पत्ति' पूँजीपतियोंके लिये बाइबिल-तुल्य हुई। इसमें व्यक्तिवादी अर्थशास्त्रका विश्लेषण है । माल्थस ( १७६६-१८४४ ) के 'जनसंख्यासम्बन्धी सिद्धान्त' का अर्थशास्त्रमें महत्त्वपूर्ण स्थान है । रिकार्डो ( १७७२-१८२३ ) के 'भूमिकर सिद्धान्त' का भी अर्थशास्त्रपर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पडा । स्टुअर्ट मिल ( १८७३-१८६६ ) के 'अर्थ- शास्त्रके सिद्धान्त' पुस्तकका भी बडा प्रभाव पडा । इन लोगोका अनेक विषयोंमे मतैक्य था । वे नैसर्गिक नियमोके समान ही अर्थशास्त्रके नियमोको भी अपरिवर्तनीय मानते थे । जैसे शीतके पश्चात् ग्रीष्म, ग्रीष्मके बाद वर्षा आनेका नियम तथा सूर्यका पूर्वमें उदय होकर पश्चिममें अस्त होनेका नियम नैसर्गिक एवं अपरिवर्तनीय है, तदनुसार प्राणीको जाड़ेमें गरम और गर्मीमें हल्के कपडे पहनने पड़ते हैं, उसी तरह अर्थशास्त्रके नियम भी अपरिवर्तनीय हैं। मनुष्यको उसके अनुकूल ही अपने-आपको बनाना पडता है । कहा जाता है कि यह सिद्धान्त पूँजीपतियोंके अनुकूल किंतु श्रमिकोंके लिये विष-तुल्य था । व्यक्तिवादी अर्थशास्त्रके सात नियम थे-१. निजी स्वार्थका नियम— इसके अनुसार 'मनुष्य तार्किक एव स्वार्थी है, वह स्वय अपना हित-अहित जानता है । सस्ता खरीदकर महँगा बेचता है । उसे स्वतन्त्रता मिलनेपर वह स्वय ही बढ़ जाता है । कहा जाता है कि इन्ही सिद्धान्तोके अनुसार 'लार्ड क्लाइव' 'वारेन हेस्टिग्ज' जैसे लोग साधारण श्रेणीसे उठकर भारतमें अग्रेजी राज्यके जन्मदाता बने और गवर्नर बने । इन लोगोंकी दृष्टिसे 'मनुष्यके हित एव समाजके हितमें विरोध नहीं है।' मनु, शुक्र, बृहस्पति आदिके मतसे कहा जा चुका है कि व्यक्तिके समुदायका नाम ही समाज है । सुतरा व्यक्तियोके सुखी हो जानेपर समाज सुखी होगा । एव समाजके सुखी होनेपर व्यक्तियोंका भी सुखी हो जाना स्वाभाविक है । २. स्वतन्त्र प्रतियोगिताका नियम- 'अपना हित-अहित समझकर